इश्क़
मंगलवार, 25 मई 2021
721. इश्क़ (10 क्षणिका)
*******
1.
इश्क़ एक सपना
***
इश्क़ एक सपना
टूटकर जुड़ता
बेचैन करवटों में
हर बार नया फिर से पलता
मगर रह जाता
सपना-सा सदा अधूरा।
______________
2.
इश्क़ एक तलवार
***
इश्क़ एक तलवार
गर म्यान से बाहर
एक झटका
धड़ बदन से ग़ायब
इश्क़-तलवार
मन-म्यान के अन्दर।
_________________
3.
इश्क़ जैसे आँधी
***
इश्क़ जैसे एक आँधी
तूफ़ान की तरह आततायी
सब मटियामेट
ज़िन्दगी भी और दुनिया भी।
____________________
4.
इश्क़ जैसे सूरज
***
इश्क़ जैसे सूरज
जीवन देता और ताप भी
जिसके माप का पैमाना है
मगर पकड़ से बाहर
वो है तो जीवन है
वो नहीं तो दुनिया नहीं।
_________________
5.
इश्क़ की दुनिया
***
इश्क़ की दुनिया गज़ब की
मिलना-बिछड़ना पर साथ-साथ होना
न कोई वायदा न कोई इसरार
मन में बसा है प्यार
भले छूट जाए संसार।
__________________
6.
फ़िज़ा में इश्क़
***
जाने ज़िन्दगी किसके जैसी
न तेरे जैसी न मेरे जैसी
थोड़ी खट्टी थोड़ी मीठी
खट्टी-मीठी इमली जैसी
सोंधी-सोंधी-सी तेरी खुशबू
फ़िज़ा में इश्क़ ज़िन्दगी ऐसी।
_____________________
7.
इश्क़ इबादत
***
दस्तूर-ए-मोहब्बत मालूम नहीं
इश्क़ ही बस एक इबादत
इतना ही मालूम है।
______________________
8.
इश्क़ का एक लम्हा
***
अल्लाह! एक दुआ क़ुबूल करो
क़यामत से पहले इतनी मोहलत दे
देना
दम टूटे उससे पहले
इश्क़ का एक लम्हा दे देना।
__________________________
9.
इश्क़ पर क़ुर्बान
***
इश्क़ के आयत की पर्ची
यादों की ताबीज़ में बंदकर
सिरहाने के दराज़ में छुपा दी
अलामतें कोई न देखे,
यादों की पूरनमासी यादों की अमावस
यादों का चक्रव्यूह जीवन थक चला है
अब यादों की ताबीज़ टूट ही जाए
ज़िन्दगी इश्क़ पर कुर्बान हो जाए।
_______________________
10.
इश्क़ की लकीर
***
ज़िन्दगी के माथे पर नसीब का टीका
ज़िन्दगी की हथेली पर इश्क़ की लकीर
फिर उम्र को परवाह क्या
पल भर मिले या सदियाँ रहे।
- जेन्नी शबनम (25. 5. 2021)
______________________
मंगलवार, 18 मई 2021
720. अब डर नहीं लगता
अब डर नहीं लगता
*******
अब डर नहीं लगता!
न हारने को कुछ शेष
न किसी जीत की चाह
फिर किस बात से डरना?
सब याद है
किस-किस ने प्यार किया
किस-किस ने दुत्कारा
किस-किस ने छला
किस-किस ने तोड़ा
किस-किस को पुकारा
किस-किस ने मुँह फेरा
सब के सब
अब कहानी-से हैं
अतीत के सभी छाले
दर्द नहीं देते
अब सुकून देते हैं
भीड़ में गुम होने की ख़ुशी देते हैं
मुक्त होने का एहसास देते हैं
बेफ़िक्र जीने का सन्देश देते हैं
फिर किस बात से डरना?
न खोने को कुछ शेष
न कुछ पाने की चाह
अब डर नहीं लगता!
- जेन्नी शबनम (18. 5. 2021)
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शनिवार, 1 मई 2021
719. कोरोना (5 कविता)
कोरोना
***
1.
ओ कोरोना (कोरोना- नवधा-198)
***
ओ कोरोना!
है कैसा व्यापारी तू
लाशों का करता व्यापार तू
और कितना रुलाएगा
कब तक यूंँ तड़पाएगा
हिम्मत हार गया संसार
नतमस्तक सारा संसार
लाशों से ख़ज़ाना तूने भर लिया
हर मौत का इल्ज़ाम तूने ले लिया
पर यम भी अब घबरा रहा
बार-बार समझा रहा
तेरे ख़ज़ाने के लिए बचा न स्थान
मरघट बन गया स्वर्ग का धाम
ओ कोरोना!
ढूँढ कोई दूजा संसार।
2.
ओ विषाणु
***
ओ विषाणु!
सुन, तुझे रक्त चाहिए
आ, आकर मुझे ले चल!
मैं रावण-सी बन जाती हूँ
हर एक साँस मिटने पर
ढेरों बदन बन उग जाऊँगी
तू अपनी क्षुधा मिटाते रहना
पर विनती है
जीवन वापस दे उन्हें
जिन्हें तू ले गया छीनकर
मैं तैयार हूँ
आ मुझे ले चल!
3.
ओ नरभक्षी
***
ओ नरभक्षी!
हर मन श्मशान बनता जा रहा है
पर तू शान से भोग करता जा रहा है
कैसे न काँपते हैं तेरे हाथ
जब एक-एक साँस के लिए
तुझसे मिन्नत करते हैं करोड़ों हाथ
और तेरा खूनी पंजा
लोगों को तड़पाकर
नोचते-खसोटते हुए
अपने मुँह का ग्रास बनाता है
अब बहुत भोग लगाया तूने
जा, सदा के लिए अब जा
अन्तरिक्ष में विलीन हो जा!
4.
ओ रक्त पिपासु
***
ओ रक्त पिपासु!
तेरे खूनी पंजे ने
हर मन, हर घर पर
चिपकाए हैं इश्तेहार-
''तुझे जो भाएगा, तू ले जाएगा
दीप, शंख, हवन, गो कोरोना गो से
तू नहीं डरता
सब तरफ़ लाल रक्त बहाएगा''
रोते, चीखते, काँपते, छटपटाते लोग
तुझे बहुत भाते हैं
पर अब तो रहम कर
जब कोई न होगा
तू किसका भोग लगाएगा।
5.
ओ पिशाच
***
ओ पिशाच!
अब दया कर
चला जा तू अपने घर
हम सब हार गए
तेरी शक्ति मान गए
ज़ख़्म दिए तूने गहरे सबको
भला कौन बचा, तू खोजे जिसको
घर-घर में मातम पसरा
कौन ताके किसका असरा
जा, तू चला जा
अब कभी न आना
बची-खुची, आधी-अधूरी दुनिया से
हम काम चला लेंगे
जिनको खोया उनकी यादों में
जीवन बिता लेंगे।
-जेन्नी शबनम (30.4.2021)
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शनिवार, 24 अप्रैल 2021
718. पतझर का मौसम
पतझर का मौसम
***
पतझर का यह मौसम है
सूखे पत्तों की भाँति चूर-चूर होकर
हमारे अपनों को
एक झटके में वहाँ उड़ाकर ले जा रहा है
जहाँ से कोई नहीं लौटता।
कितना भी तड़पें
कितना भी रोएँ
जाने वाले वापस नहीं आएँगे
उनसे दोबारा हम मिल न पाएँगे
काल की गर्दन तक हम पहुँच नहीं पाएँगे
न उससे छीनकर किसी को लौटा लाएँगे।
सँभालने को कोई नहीं
सँभलने का कोई इन्तिज़ाम नहीं
न दुआओं में ताक़त बची
न मन्नतें कामयाब हो रहीं
संसार की सारी सम्पदाएँ, सारी संवेदनाएँ
एक-एककर मृत होती जा रही हैं।
श्मशानों में तब्दील होता जा रहा है खिलखिलाता शहर
तड़प-तड़पकर, घुट-घुटकर मर रहा नगर
झीलें रो रही हैं
ओस की बूँदें सिसक रही हैं
फूल खिलने से इन्कार कर रहा है
आसमान का चाँद उगना नहीं चाहता
रात ही नहीं, दिन में भी अमावस-सा अँधेरा है
हवा बिलख रही है
सूरज भी सांत्वना के बोल नहीं बोल पा रहा है।
जाने किसने लगाई है ऐसी नज़र
लाल किताब भी हो रहा बेअसर
पतझर का मौसम नहीं बदल रहा
न ज़रा भी तरस है उसकी नज़रों में
न ज़रा भी कमज़ोर हो रही हैं उसकी बाहें
हमरा सब छीनकर
दु:साहस के साथ हमसे ठट्ठा कर रहा है
अपनी ताक़त पर अहंकार से हँस रहा है
अब और कितना बलिदान लेगा?
ओ पतझर! अब तू चला जा
हमारा हौसला अब टूट रहा है
मुट्ठी से जीवन फिसल रहा है
डरे-डरे-से हम, बेज़ार रो रहे हैं
नियति के आगे अपाहिज हो गए हैं
हर रोज़ हम ज़रा-ज़रा टूट रहे हैं
हर रोज़ हम थोड़ा-थोड़ा मर रहे हैं।
पतझर का यह मौसम
कुछ माह नहीं, साल की सीमाओं से परे जा चुका है
यह दूसरा साल भी सभी मौसमों पर भारी पड़ रहा है
पतझर का यह मौसम, जाने कब बीतेगा?
कब लौटेंगी बची-खुची ज़िन्दगी?
जिससे लगे कि हम थोड़ा-सा जीवित हैं।
-जेन्नी शबनम (24.4.2021)
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रविवार, 18 अप्रैल 2021
717. प्रेम में होना
प्रेम में होना
***
प्रेम की पराकाष्ठा कहाँ तक
बदन के घेरों में या मन के फेरों में?
सुध-बुध बिसरा देना प्रेम है
या स्वयं का बोध होना प्रेम है।
अनकहा प्रेम भी होता है
न मिलाप, न अधिकार
पर प्रेम है कि बहता रहता है
अविरल और अविचलित।
प्रेम की परिभाषाएँ ढेरों गढ़ी गईं
पर सबसे सटीक कोई नहीं
अपने-अपने मन की आस्था
अपने-अपने प्रेम की अवस्था।
प्रेम अक्सर पा तो लिया जाता है
पर वह लेन-देन तक सिमट जाता है
हम सभी भूल गए हैं प्रेम का अर्थ
लालसा में भटकता जीवन है व्यर्थ
प्रेम का मूल तत्त्व बिसर गया है
स्वार्थ की परिधि में प्रेम बिखर गया है।
प्रेम पाया नहीं जाता
प्रेम जबरन नहीं होता
प्रेम किया नहीं जाता
प्रेम में रहा जाता है
प्रेम जीवन है
प्रेम जिया जाता है।
-जेन्नी शबनम (18.4.2021)
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शुक्रवार, 9 अप्रैल 2021
716. ज़िन्दगी भी ढलती है
ज़िन्दगी भी ढलती है
*******
पीड़ा धीरे-धीरे पिघल, आँसुओं में ढलती है
वक़्त की पाबन्दी है, ज़िन्दगी भी ढलती है।
अजब व्यथा है, सुबह और शाम मुझमें नहीं
बस एक रात ही तो है, जो मुझमें जगती है।
चाहके भी समेट न पाई, तक़दीर अपनी
बामुश्किल बसर हो जो, ज़िन्दगी क्यों मिलती है।
मैं तो ठहरी रही, सदियों से ख़ुद में ही छुपके
वक़्त की बेबसी, सदियाँ बेतहाशा उड़ती है।
जाने क्यों हर रास्ता, मुझसे पीछे छूटा है
मैं अनजानी, ज़िन्दगी बेअख्तियार उड़ती है।
दिन की कहानी, मुमकिन ही कहाँ कि 'शब' बताए
रात ज़िन्दगी उसकी, रात की कहानी कहती है।
- जेन्नी शबनम (9. 4. 2021)
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सोमवार, 29 मार्च 2021
715. होली मइया (होली पर 21 हाइकु)
होली मइया
(होली पर 21 हाइकु)
***
1.
उन्मुक्त रंग
ऋतुराज बसन्त
फगुआ गाते।
2.
बन्धन मुक्त
भेदभाव से मुक्त,
होली सन्देश।
3.
फगुआ आया
फूलों ने खिलकर
रंग बिखेरा।
4.
घुँघट काढ़े
पी की राह अगोरे
बावरी प्रिया।
5.
कैसी ये होली
नइहर वीरान
अम्मा न बाबा।
6.
माँ को ले गया,
वक़्त बड़ा निष्ठुर
होली ले आया।
7.
झूम के गाओ
जोगीरा सा-रा रा-रा
रंग चिहुँका।
8.
रंग गुलाल
पुआ व पकवान
होली के यार।
9.
होली का पर्व
सरहद पे पिया,
कैसे मनाऊँ?
10.
मलो गुलाल
चढ़ा प्रेम का रंग,
मिटा मलाल।
11.
भूलाके रार
खेलो होली त्योहार,
ज़िन्दगी छोटी।
12.
लेकर आईं
उत्सव की स्मृतियाँ
होली का दिन।
13.
कैसे थे दिन
नाचती थीं हवाएँ
होली के संग।
14.
अबकी होली
पीर लिए है आई
नहीं है माई।
15.
द्वार पे खड़ी
मनुहार करती
रँगीली होली।
16.
आज के दिन
होली दुःखहारिणी
पीर हरती।
17.
नशे में धुत्त
भाँग पीके नाचती
होली नशेड़ी।
18.
होली की दुआ-
अशुभ का नाश हो
साल शुभ हो!
19.
ठिठका रंग
देख जग का रंग
आहत होली।
20.
होली का दिन
मुँह लटका, खड़ा
टेसू का फूल।
21.
होली मइया,
मन में पीर बड़ा
रीसेट करो।
-जेन्नी शबनम (28.3.2021)
____________________
सोमवार, 22 मार्च 2021
714. झील (झील पर 30 हाइकु)
झील
(झील पर 30 हाइकु)
***
1.
अद्भुत छटा
आत्ममुग्ध है झील
ख़ुद में लीन।
2.
ता-ता थइया
थिरकती झील
वो अलबेली।
3.
अनवरत
हुड़दंग मचाती
नाचती झील।
4.
आसमाँ फेंके
झील बेचारी हाँफे
धरती लोके।
5.
कोई न साथी
दुःख किससे बाँटे
एकाकी झील।
6.
पीती रहती
बड़ी प्यासी है झील
अपना नीर।
7.
रोज़ बुलाती
स्वप्न सुन्दरी झी ल
मन लुभाती।
8.
अद्भुत झील
वो कहाँ से है लाती?
इतना पानी।
9.
झील लजाई
चाँद ने जो पुकारा
आकर मिला।
10.
झील-सा मन
तेरी यादों की नाव
बहती रही।
11.
ठहरा मन
हलचल के बिना
जीवन-झील।
12.
बुरा मानती
प्रदूषण की मारी
चुप है झील।
13.
झील उदास
कोरोना का क़हर
कोई न पास।
14.
झील-झरना
प्रकृति की संतान
भाई-बहना।
15.
काश बहती
नदियों-सी घूमती,
झील सोचती!
16.
चाँदनी रात
झील की आगोश में
बैठा है चाँद।
17.
थका सूरज
करने को आराम
झील में कूदा।
18.
झील है बेटी
प्रकृति को है नाज़
लेती बलैयाँ।
19.
झील व चाँद
लुका-छुपी खेलते
दिन व रात।
20.
झील निगोड़ी
इतनी ख़ूबसूरत
फिर भी तन्हा!
21.
झील सिखाती-
ठहरे हुए जीना,
नहीं हारना।
22.
कैसे वो पीती
प्रदूषित है पानी,
प्यासी है झील।
23.
झील बेहाल
मीन दम तोड़ती
बंजर कोख।
24.
झील चकोर
आसमाँ को बुलाती
बैठी रहती।
25.
झील में नभ
चुपचाप है छुपा
चाँद ढूँढता।
26.
झील-सा स्वप्न
चौहद्दी में है कैद
बहा, न मरा।
27.
झील-सी आँखें
देखती स्वप्न पूर्ण
होती अपूर्ण।
28.
झील डरती,
मानव व्यभिचारी
प्राण न छीने।
29.
झील की गोद
नरम-मुलायम
माँ की गोद।
30.
झील है थकी,
सदियों से है थमी
क्यों यह कमी?
-जेन्नी शबनम (22.3.2021)
____________________
गुरुवार, 18 मार्च 2021
713. अनाथ
अनाथ
***
काश! हवा या धुआँ बनकर
आसमान में जाती
चाँद की चाँदनी में उन तारों को ढूँढती
जो बचपन में मेरे पापा बन गए
और अब माँ भी उन्हीं का हिस्सा है।
न जाने वहाँ पापा कैसे होंगे
इतने साल अकेले कैसे रहे होंगे?
नहीं! नहीं! वे वहाँ किताबें पढ़ते होंगे
वहाँ से देखते होंगे कि उनके सिद्धान्तों को
हमने कितना जाना, कितना अपनाया
वे बहुत बूढ़े हो गए होंगे
उम्र तो तारों की भी बढ़ती होगी
क्या मुझे याद करते होंगे?
वे तो मुझे पहचानेंगे भी नहीं
जब वे गए मैं छोटी बच्ची थी
जब पहचानेंगे
तो क्या अब भी गोद में बिठाकर दुलार करेंगे?
बचपन की तरह अब भी रूठने पर मनाएँगे?
उसी तरह प्यार करेंगे?
पर माँ तो पहचानती है
अभी-अभी तो गई है
ये विदाई तो अभी बहुत नई है
मुझे देखते ही बड़े लाड़ से गले लगाएगी
रोएगी, मुझे ढाढस देगी
मेरे अनाथ हो जाने पर
ख़ुद की क़िस्मत पर नाराज़ होगी
रुँधी हुई उसकी आवाज़ होगी
वह बताएगी कि कैसे अन्तिम साँस लेते समय
चारों तरफ़ मुझे ढूँढ रही थी
एक अन्तिम बार देखने को तड़प रही थी।
कितनी बेबस रही होगी
कितना कुछ कहना चाहती होगी
मेरे अकेलेपन के ग़म में रोई होगी
कितनी आवाज़ दी होगी मुझे
पर साँसे घुट रही होंगी
आवाज़ हलक में अटक रही होगी
वह रो रही होगी, छटपटा रही होगी
मेरी बहुत याद आ रही होगी
यम से मिन्नत करती होगी कि ज़रा-सा वक़्त दे-दे
बेटी से एक बार तो मिल लेने दे।
वक़्त तो सदा का असंवेदनशील
न पापा के समय मेरे लिए रुका
न मम्मी के लिए
अपनी मनमानी कर गया
मम्मी चली गई
बिना कुछ कहे चली गई
तारों में गुम हो गई।
अब कोई नहीं जो मेरा मन समझेगा
अब कोई नहीं जो मेरा ग़म बाँटेगा
मेरे हर दर्द पर मुझसे ज़्यादा तड़पेगा
मेरी फ़िक्र में हर समय बेहाल रहेगा
न पापा थे, न मम्मी है
दोनों अलविदा कह गए
जिनको जाते वक़्त मैंने न सुना, न देखा।
काश! तुम दोनों तारों के झुरमुट में मिल जाओ
एक बार गले लगा जाओ
पापा के बिना जीने का हौसला तुमने दिया था
अब तुम्हारे बिना जीने का हौसला कौन देगा माँ?
शुक्रवार, 12 मार्च 2021
712. रिश्ते हैं फूल (रिश्ता पर 20 सेदोका)
रिश्ते हैं फूल
(रिश्ता पर 20 सेदोका)
*******
1.
रिश्ते हैं फूल
भौतिकता ने छीने
रिश्तों के रंग-गंध
मुरझा गए
नहीं कोई उपाय
कैसे लौटे सुगंध।
2.
रिश्ते हैं चाँद
समय है बादल
ओट में जाके छुपा
समय स्थिर
ओझल हुए रिश्ते
अमावस पसरी।
3.
पावस रिश्ते
वक़्त ने किया छल
छिन्न-भिन्न हो गए
मिटी है आस
मन का प्रदूषण
तिल-तिल के मारे।
4.
कुंठित मन
रिश्ते हो गए ध्वस्त
धीरे-धीरे अभ्यस्त
वापसी कैसे?
जेठ की धूप जैसे
कठोर जिद्दी मन।
5.
रिश्तों का कत्ल
रक्त बिखरा पड़ा
अपने ही क़ातिल,
रोते ही रहे
कैसे दे पाते सज़ा
अपराधी अपने।
6.
टोना-टोटका
किसी ने तो है किया
मृतप्राय है रिश्ता,
ओझा भी हारा
झाड़-फूँक है व्यर्थ
हम हैं असमर्थ।
7.
मन आहत
वक़्त का काला जादू
रिश्ते बने बोझिल,
वक़्त मिटाए
नज़र का डिठौना
औघड़ निरूपाए।
8.
बावरा मन
रिश्तों की बाट जोहे
दे करके दुहाई,
आस का पंछी
अब भी है जीवित
शायद प्राण लौटें।
9.
रिश्ते पखेरू,
उड़के चले गए
दाना-पानी न मिला
खो गए रिश्ते,
चुगने नहीं आते
कितना भी बुलाओ।
10.
जिलाके रखो
मन भर दुलारो
कभी खोए न रिश्ते
मर जो गए
कितने भी जतन
लौटते नहीं रिश्ते।
11.
वाणी का तीर
मन हुआ छलनी
घायल हुए रिश्ते
मन की पीर
कोई कहे किससे
दिल गया है छील।
12.
दुर्गम रास्ते
चल सको अगर
सँभलकर चलो
रिश्ते सँभालो,
पाँव छिले, लगा लो
रिश्तों के मलहम।
13.
घायल रिश्ता
लहूलुहान पड़ा
ज्यों पर कटा पक्षी,
छटपटाए
पर उड़ न पाए
आजीवन तड़पे।
14.
अजब दौर
बँट गई दीवारें
ज्यों रिश्ते हों कटारें,
भेज न पाएँ
मन की पीर-पाती
बंद हो गए द्वारे।
15.
रिश्ते दरके
रिस-रिसके बहे
नस-नस के आँसू,
मन घायल
संवेदना है मौन
समझे भला कौन?
16.
बादल रिश्ते
जमकर बरसे
प्रेम के फूल खिले,
मन भँवरा
प्रेम की फूलवारी
सुगंध से अघाए।
17.
मौसम स्तब्ध
रिश्ते की मौत हुई
आसमाँ भी रो पड़ा,
नज़र लगी
हँसी भी रूठ गईं
मातम है पसरा।
18.
खिलते रिश्ते
साथ जो हैं चलते
खनकती है हँसी
साथ जो रहें
कोई कभी न तन्हा
आए आँधी या तूफाँ।
19.
गाछ-से रिश्ते
कभी तो हरियाए
कभी तो मुरझाए
प्रीत-बरखा
बरसते जो रहे
गाछ उन्मुक्त जिए।
20.
रिश्तों की डोर
कभी मत तू छोड़
रख मुट्ठी में जोड़
हाथ से छूटे
कटी गुड्डी-से रिश्ते
साबुत नहीं मिले।
- जेन्नी शबनम (29. 1. 2021)
______________________
सोमवार, 8 मार्च 2021
711. अब नहीं हारेगी औरत
अब नहीं हारेगी औरत
*******
जीवन के हर जंग में हारती है औरत
ख़ुद से लड़ती-भिड़ती हारती है औरत
सुख समेटते-समेटते हारती है औरत
दुःख छुपाते-छुपाते हारती है औरत
भावनाओं के जाल में उलझी हारती है औरत
मन पर पैबंद लगाते-लगाते हारती है औरत
टूटे रिश्तों को जोड़ने में हारती है औरत
परायों से नहीं अपनों से हारती है औरत
पति-पत्नी के रिश्तों में हारती है औरत
पिता-पुत्र के अहं से हारती है औरत
बेटा-बेटी के द्वन्द्व से हारती है औरत
बहु-दामाद के छद्म से हारती है औरत
दुनियादारी के संघर्ष से हारती है औरत
दुनिया की भीड़ में गुम हारती है औरत
अपनी चुप्पी से ही सदा हारती है औरत
तोहमतों के बाज़ार से हारती है औरत
ख़ुद सपनों को तोड़के हारती है औरत
ख़ुद को साबुत रखने में हारती है औरत
जीवन भर हँस-हँसकर हारती है औरत
जाने क्यों मरकर भी हारती है औरत
जीवन के हर युद्ध में हारती है औरत।
अब हर हार को जीत में बदलेगी औरत
किसी भी युद्ध में अब नहीं हारेगी औरत।
- जेन्नी शबनम (8. 3. 2021)
_______________________________
बुधवार, 27 जनवरी 2021
710. भोर की वेला (भोर पर 7 हाइकु)
भोर की वेला
***
1.
माँ-सी जगाएँ
सुनहरी किरणें
भोर की वेला।
2.
पाखी की टोली
भोरे-भोरे निकली
कर्म निभाने।
3.
किरणें बोलीं-
जाओ, काम पे जाओ
पानी व पाखी।
4.
सूरज जागा
आँख मिचमिचाता
जग भी जागा।
5.
नया जीवन,
प्रभात रोज़ देता
शुभ संदेश।
6.
मन सोचता-
पंछी-सा उड़ पाता
छूता अम्बर।
7.
रोज रँगता
प्रकृति चित्रकार
अद्भुत छटा।
-जेन्नी शबनम (24.1.2021)
____________________
बुधवार, 20 जनवरी 2021
709. बात इतनी सी है
बात इतनी सी है
*******
चले थे साथ बात इतनी सी है
जिए पर तन्हा बात इतनी सी है।
वे मसरूफ़ रहते तो बात न थी
मग़रूर हुए बात इतनी सी है।
मुफ़लिसी के दिन थे पर कपट न की
ग़ैरतमंद हूँ बात इतनी सी है।
झूठे भ्रम में जीया जीवन मैंने
कोई न अपना बात इतनी सी है।
हमदर्द नहीं होता कोई यहाँ
सब है छलावा बात इतनी सी है।
ख़ुद से हर ग़म बाँटा ऐ मेरे ख़ुदा
तुम भी हो ग़ैर बात इतनी सी है।
सोच समझके अब तुम बोलना ‘शब‘
जग है पराया बात इतनी सी है।
- जेन्नी शबनम (20. 1. 2021)
_________________________
सोमवार, 11 जनवरी 2021
708. आकुल (5 माहिया)
आकुल
*******
1.
जीवन जब आकुल है
राह नहीं दिखती
मन होता व्याकुल है।
2.
हर बाट छलावा है
चलना ही होगा
पग-पग पर लावा है।
3.
रूठे मेरे सपने
अब कैसे जीना
भूले मेरे अपने।
4.
जो दूर गए मुझसे
सुध ना ली मेरी
क्या पीर कहूँ उनसे।
5.
जीवन एक झमेला
सब कुछ उलझा है
यह साँसों का खेला।
- जेन्नी शबनम (10. 1. 2021)
_______________________
गुरुवार, 7 जनवरी 2021
707. कम्फ़र्ट ज़ोन से बाहर
कम्फर्ट ज़ोन से बाहर
***
कम्फर्ट ज़ोन से बाहर
जोखिमों की लम्बी क़तार को
बच-बचाकर लाँघ जाना
क्या इतना आसान है
बिना लहूलुहान पार करना?
हर एक लम्हा संघर्ष है
क़दम-क़दम पर द्वेष है
यक़ीन करना बेहद कठिन है
विश्वास पल-पल दम तोड़ता है
सरेआम लुट जाते हैं सपने
ग़ैरों से नहीं, अपनों से मिलते हैं धोखे
कोई कैसे कम्फर्ट ज़ोन से बाहर आए?
कम्फर्ट ज़ोन की सुविधाएँ
नि:सन्देह कमज़ोर बनाती हैं
अवरोध पैदा करती हैं
मन के विस्तार को जकड़ती हैं
सम्भावनाओं को रोकती हैं।
परन्तु कम्फर्ट ज़ोन से बाहर
एक विस्तृत संसार है
जहाँ सम्भावनाओं के ढेरों द्वार हैं
कल्पनाओं की सीढ़ियाँ हैं
उत्कर्ष पर पहुँचने के रास्ते हैं।
चुनने की समझदारी विकसित कर
शह-मात से निडर होकर
चलनी है हर बाज़ी
विफलता मिले, तो रुकना नहीं
ठोकरों से डरना नहीं
बेख़ौफ़ चलते जाना है।
रास्ता अनजाना है मगर
संसार को परखना है
ख़ुद को समझना है
ताकि रास्ता सुगम बने
कामनाओं की फुलवारी से
मनमाफ़िक फूल चुनना है
जो जीवन को सुगन्धित करे।
अब वक़्त आ गया है
कम्फर्ट ज़ोन से बाहर आकर
दुनिया को अपनी शर्तों से
मुट्ठी में समेटकर
जीवन में ख़ुशबू भरना है
कम्फर्ट ज़ोन से बाहर आना है।
याद रहे एक कम्फर्ट ज़ोन से
निकल जाओ जब
दूसरा कम्फर्ट ज़ोन स्वयं बन जाता है
पर किसी कम्फर्ट ज़ोन को
स्थायी मत होने दो।
-जेन्नी शबनम (7.1.2021)
(पुत्री के 21वें जन्मदिन पर)
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मंगलवार, 5 जनवरी 2021
706. कहानियाँ (5 क्षणिका)
कहानियाँ
*******
1.
कहानी
***
कहानी में मैं मुझमें ही कहानी
कहता कौन सुनता कौन
पन्नों पर रच दी कहानी
और मैं बन गई इतिहास।
2.
छोटी कहानी
***
छोटे-छोटे लम्हों में
यादों की ढेरों कतरन हैं
सबको इकट्ठाकर
छोटी-छोटी कहानी रचती हूँ
अकेलेपन में यादों से कहानियाँ निकल
मेरे चेहरे पे खिल जाती हैं।
3.
मेरी कहानी
***
मेरे युग के प्रारम्भ से
मेरे युग के अंत तक की
कथा लिख दी किसी ने
किसने, यह नहीं मालूम
न भाषा मालूम न लिखावट
पर इतना मालूम है
कहानी मेरी है।
4.
एक कहानी
***
रात के धागे में हर रोज़
यादों के मोती पिरोती हूँ
हर मोती एक कहानी
हर कहनी मेरी ज़िन्दगी
अब सब चाँद के लॉकर में
रख दिया है संजोकर
जीवन के अमावस में
ज़रूरत पड़ेगी।
5.
असली कहानी
***
बचपन की कहानी बड़ी निराली
दो पंक्तियों में पूरी कहानी
एक था राजा एक थी रानी
दोनों मर गए ख़तम कहानी
तब मालूम कहाँ था
जीने और मरने के बीच बनती है
जीवन की असली कहानी।
- जेन्नी शबनम (5. 1. 2021)
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शुक्रवार, 1 जनवरी 2021
705. नूतन वर्ष (10 हाइकु)
नूतन वर्ष
***
1.
दसों दिशाएँ
करती हैं स्वागत
नूतन वर्ष।
2.
देकर दुःख
बीता पुराना साल
बेवफ़ा जैसे।
3.
आई द्वार पे
उम्मीद की किरणें
नया बरस।
4.
विस्मृत करें
बीते साल की चालें
मन के छाले।
5.
डर से भागा,
आया जो नव वर्ष
पुराना वर्ष।
6.
बीता बरस
चला गया निर्मोही
यादें देकर।
7.
याद आएगा
सुख-दु:ख का साथी
साल पुराना।
8.
वर्ष ज्यों बीता
वक्त के पिंजड़े से
फुर्र से उड़ा।
9.
बड़ा सताया
किसी को न बिसरा
गुज़रा साल।
10.
आशा का दीप
लेकर आया साल
मन सजाओ।
-जेन्नी शबनम (1.1.2021)
___________________
गुरुवार, 31 दिसंबर 2020
704. मुट्ठी से फिसल गया
मुट्ठी से फिसल गया
***
निःसन्देह बीता कल नहीं लौटेगा
जो बिछड़ गया अब नहीं मिलेगा
फिर भी रोज़-रोज़ बढ़ती है आस
शायद मिल जाए वापस
जो जाने-अनजाने बन्द मुट्ठी से फिसल गया।
ख़ुशियों की ख़्वाहिश ही दुःखों की फ़रमाइश है
पर मन समझता नहीं, हर पल ख़ुद से उलझता है
हर रोज़ की यही व्यथा, कौन सुने इतनी कथा?
वक़्त को दोष देकर
कोई कैसे ख़ुद को निर्दोष कहेगा?
क्यों दूसरों का लोर-भात एक करेगा?
बहाने क्यों?
कह दो, बीता कल शातिर खेल था
अवांछित सम्बन्धों का मेल था
जो था सब बेकार था, अविश्वास का भण्डार था
अच्छा हुआ, बन्द मुट्ठी से फिसल गया।
अमिट दूरियों का अन्तहीन सिलसिला है
उम्मीदों के सफ़र में आसमान-सा सन्नाटा है
पर अतीत के अवसाद में कोई कब तक जिए
कितने-कितने पीर मन में लेकर फिरे
वक़्त भी वही, उसकी चाल भी वही
बरज़ोरी से छीननी होगी खुशियाँ।
नहीं करना है अब शोक कि साथ चलते-चलते
चन्द क़दमों का फ़ासला, मीलों में बढ़ गया
रिश्ते-नाते, नेह-बन्धन मन की देहरी पर ढह गया
देखते-देखते सब, बन्द मुट्ठी से फिसल गया।
-जेन्नी शबनम (31.12.2020)
_____________________
रविवार, 20 दिसंबर 2020
703. तकरार
तकरार
***
आत्मा और बदन में तकरार जारी है
बदन छोड़कर जाने को आत्मा उतावली है
पर बदन हार नहीं मान रहा
आत्मा को मुट्ठी से कसकर भींचे हुए है
थक गया, मगर राह रोके हुए है।
मैं मूकदर्शक-सी
दोनों की हाथापाई देखती रहती हूँ
कभी-कभी ग़ुस्सा होती हूँ
तो कभी ख़ामोश रह जाती हूँ
कभी आत्मा को रोकती हूँ
तो कभी बदन को टोकती हूँ
पर मेरा कहा दोनों नहीं सुनते
और मैं बेबसी से उनको ताकती रह जाती हूँ।
कब कौन किससे नाता तोड़ ले
कब किसी और जहाँ से नाता जोड़ ले
कौन बेपरवाह हो जाए, कौन लाचार हो जाए
कौन हार जाए, कौन जीत जाए
कब सारे ताल्लुक़ात मुझसे छूट जाए
कब हर बन्धन टूट जाए
कुछ नहीं पता, अज्ञात से डरती हूँ
जाने क्या होगा, डर से काँपती हूँ।
आत्मा और बदन साथ नहीं
तो मैं कहाँ?
तकरार जारी है
पर मिटने के लिए
मैं अभी राज़ी नहीं।
-जेन्नी शबनम (20.12.2020)
_____________________
शुक्रवार, 18 दिसंबर 2020
702. गंगा (20 हाइकु)
गंगा
***
1.
चल पड़ी हूँ
सागर से मिलने
गंगा के संग।
2.
जीवन गंगा
सागर यों ज्यों क़ज़ा
अन्तिम सत्य।
3.
मुक्ति है देती
पाप-पुण्य का भाव
गंगा है न्यारी।
4.
सब समाया
जीवन और मृत्यु
गंगा की गोद।
5.
हम हैं पापी
गंगा को दुःख देते
कर दूषित।
6.
निश्छल प्यार
सबका बेड़ा पार
गंगा है माँ-सी।
7.
पावनी गंगा
कल-कल बहती
जीवन देती।
8.
बसा जीवन
सदियों का ये नाता
गंगा के तीरे।
9.
गंगा की बाहें
सबको समेटती
भलें हों पापी।
10.
जीवन बाद
गंगा में प्रवाहित
अन्तिम लक्ष्य।
11.
गंगा है हारी
वो जीवनदायिनी
मानव पापी।
12.
गंगा की पीर
गन्दगी को पी-पीके
हो गई मैली।
13.
क्रूर मानव
अनदेखा करता
गंगा का मन।
14.
प्रचण्ड गंगा
बहुत बौखलाई
बाढ़ है लाई।
15.
गंगा से सीखो
सब सहकरके
धरना धीर।
16.
हमें बुलाती
कल-कल बहती
गंगा हमारी।
17.
गंगा प्रचण्ड
रौद्र रूप दिखाती
जब ग़ुस्साती।
18.
गंगा है प्यासी
उपेक्षित होके भी
प्यास बुझाती।
19.
पावनी गंगा
जग के पाप धोके
हुई लाचार।
20.
किरणें छूतीं
पाके सूर्य का प्यार
गंगा मुस्काती।
-जेन्नी शबनम (17.12.2020)
_____________________
रविवार, 13 दिसंबर 2020
701. पत्थर या पानी
पत्थर या पानी
***
मेरे अस्तित्व का प्रश्न है
मैं पत्थर बन चुकी या पानी हूँ?
पत्थरों से घिरी, मैं जीवन भूल चुकी हूँ
शायद पत्थर बन चुकी हूँ
फिर हर पीड़ा मुझे रुलाती क्यों है?
हर बार पत्थरों को धकेलकर
जिधर राह मिले, बह जाती हूँ
शायद पानी बन चुकी हूँ
फिर अपनी प्यास से तड़पती क्यों हूँ?
हर बार, बार-बार
पत्थर और पानी में बदलती मैं
नहीं जानती, मैं कौन हूँ।
-जेन्नी शबनम (12.12.2020)
_____________________
बुधवार, 2 दिसंबर 2020
700. स्त्री हूँ (10 क्षणिका)
स्त्री हूँ
*******
1.
स्त्री हूँ
***
स्त्री हूँ, वजूद तलाशती
अपना एक कोना ढूँढती
अपनों का ताना-बाना जोड़ती
यायावरता मेरी पहचान बन गई है
शनै-शनै मैं खो रही हूँ मिट रही हूँ
पर मिटना नहीं चाहती
स्त्री हूँ, स्त्री बनकर जीना चाहती हूँ।
2.
अकेली
***
रह जाती हूँ
बार-बार हर बार
बस अपने साथ
मैं, नितांत अकेली।
3.
भूल जाओ
***
सपने तो बहुत देखे
पर उसे उगाने के लिए
न ज़मीन मिली न मैंने माँगी
सपने तो सपने हैं सच कहाँ होते हैं
बस देखो और भूल जाओ।
4.
छलाँग
***
आसमान की चाहत में
एक ऊँची छलाँग लगाई मैंने
भर गया आसमान मुट्ठी में
पाँव के नीचे लेकिन ज़मीं ना रही।
5.
ज़िन्दगी जी ली
***
ज़िंदा रहने के लिए
सपनों का मर जाना बेहद ख़तरनाक है
मालूम है फिर भी एक-एककर
सारे सपनों को मार दिया
ख़ुद ही पाँव पर कुल्हाड़ी मारी
और ज़िन्दगी जी ली मैंने।
6..
हँस पड़ी वह
***
वह हँसी, वह बोली
इतना दंभ, इतनी हिमाक़त
उसे मर्यादित होना चाहिए
उसे क्षमाशील होना चाहिए
उसकी जाति का यही धर्म है
पर अब अधर्मी होना स्वीकार है
यही एक विकल्प है
आज फिर हँस पड़ी मैं।
7.
जर्जर
***
आख़िरकार मैं घबराकर
घुस गई कमरे के भीतर
तूफ़ान आता, कभी जलजला
हर बार ढहती रही, बिखरती रही
पर जब भी खिड़की से बाहर झाँका
साबुत होने के दम्भ के साथ
खंडहर नहीं छुपा सकता, काल के चक्र को
अंततः सबने देखा झरोखे से झाँकती, जवान काया
जो अब डरावनी और जर्जर है।
8.
बाँझ
***
मन में अब कुछ नहीं उपजता
न स्वप्न न कामना
किसी अपने ने पीछे से वार किया
हर रोज़ बार-बार हज़ार बार
कोमल मन खंजर की वार से बंजर हो गया है
मेरा मन अब बाँझ है।
9.
खुदाई ***
जाने क्यों, ज़माना बार-बार खुदाई करता है
गहरी खुदाई पर, मन ने हरकत कर ही दी
दिल पर खुदी दर्द की तहरीर
ज़माने ने पढ़ ली और अट्टहास किया
जाने कितनी सदियों से, सब कुछ दबा था
अँधेरी गुफ़ाओं में, तहख़ाने के भीतर
अब आँसुओं का सैलाब है
जो झील बन चुका है।
10.
जबरन
***
अतीत की बेवकूफ़ियाँ
मन का पछतावापन
गाहे-बगाहे, चाहे न चाहे
वक़्त पाते ही बेधड़क घुस आता है
उन सभासदों की तरह जबरन
जिनका उस क्षेत्र में प्रवेश-निषेध है
न हँसने देता है न रोने देता है
और झिंझोड़कर रख देता है
पूरा का पूरा वजूद!
- जेन्नी शबनम (2. 12. 2020)
______________________
बुधवार, 25 नवंबर 2020
699. दागते सवाल
दागते सवाल
***
यही तो कमाल है
सात समंदर पार किया, साथ समय को मात दी
फिर भी कहते हो-
हम साथ चलते नहीं हैं।
हर स्वप्न को बड़े जतन से ज़मींदोज़ किया
टूटने की हद तक ख़ुद को लुटा दिया
फिर भी कहते हो-
हम साथ देते नहीं हैं।
अविश्वास की नदी अविरल बह रही है
दागते सवाल, मुझे झुलसा रहे हैं
मेरे अन्तस् का ज्वालामुखी अब धधक रहा है
फिर भी कहते हो-
हम जलते क्यों नहीं हैं।
हाँ! यह सत्य अब मान लिया
सारे उपक्रम धाराशायी हुए
धधकते सवालों की चिनगारी
कलेजे को राख बना चुकी है
साबुत मन तरह-तरह के सामंजस्य में उलझा
चिन्दी-चिन्दी बिखर चुका है।
बड़ी जुगत से चाँदनी वस्त्रों में लपेटकर
जिस्म के मांस की पोटली बनाई है
दागते सवालों से झुलसी पोटली
सफ़र में साथ है
ज़रा-सा थमो
जिस्म की यह पोटली
दिल की तरह खुलकर
अब बस बिखरने को है।
-जेन्नी शबनम (25.11.2020)
_____________________
सोमवार, 23 नवंबर 2020
698. भटकना (क्षणिका)
भटकना
*******
सारा दिन भटकती हूँ
हर एक चेहरे में अपनों को तलाशती हूँ
अंतत: हार जाती हूँ
दिन थक जाता है रात उदास हो जाती है
हर दूसरे दिन फिर से वही तलाश, वही थकान
वही उदासी, वही भटकाव
अंततः कहीं कोई नहीं मिलता
समझ में आ गया, कोई दूसरा अपना नहीं होता
अपना आपको ख़ुद होना होता है
और यही जीवन है।
- जेन्नी शबनम (23. 11. 2020)
_______________________
मंगलवार, 17 नवंबर 2020
697. वसीयत
वसीयत
***
ज़ीस्त के ज़ख़्मों की कहानी तुम्हें सुनाती हूँ
मेरी उदासियों की यही है वसीयत
तुम्हारे सिवा कौन इसको सँभाले
मेरी यह वसीयत अब तुम्हारे हवाले
हर लफ़्ज़ जो मैंने कहे, हर्फ़-हर्फ़ याद रखना
इन लफ़्ज़ों को ज़िन्दा, मेरे बाद रखना
किसी से कुछ न कभी तुम बताना
मेरी यह वसीयत, मगर मत भूलाना
तुम्हारी मोहब्बत ही है मेरी दौलत
मेरे लफ़्ज़ ज़िन्दा हैं इसकी बदौलत।
उस दौलत ने दिल को धड़कना सिखाया
हर साँस पर था जो क़र्ज़ा चुकाया
मेरे ज़ख़्मों की अब मुझको परवाह नहीं है
लबों पे मेरे अब कोई आह नहीं है
अगर्चे अभी भी कोई सुख नहीं है
ग़म तुमने समझा, तो अब दुःख नहीं है।
ग़ैरों की भीड़ में मुझको कई अपने मिले थे
मगर जैसे सारे ही सपने मिले थे
मुझसे किसी ने कहाँ प्यार किया था
वार अपनों ने खंजर से सौ बार किया था
मन ज़ख़्मी हुआ, ताउम्र आँखों से रक्त रिसता रहा
किसे मैं बताती कि दोष इसमें किसका रहा
क़िस्मत ने जो दर्द दिया, तोहफ़ा मान सब सहेजा
मैंने क़दमों को टोका, क़िस्मत को दिया न धोखा
जीवन में नाकामियों की हज़ारों दास्तान है
हर पग के साथ बढ़ता छल का अम्बार है
मेरी हर साँस में मेरी एक हार है।
जीकर तो किसी के काम न आ सकी
मेरे जीवन की किसी को कभी भी न दरकार थी
मेरे शरीर का हर एक अंग मैंने दुनिया को दान किया
पर कभी यह न सोचा, मैंने कोई अहसान किया
मैं जब न रहूँ, कइयों के बदन को नया जीवन दिलाना
बिजली की भट्टी में इसे तुम जलाना
भट्टी में जब मेरा बदन राख बन जाएगा
आधे राख को गंगा में वहाँ लेकर जाना
वहीं पर बहाना
जहाँ मेरे अपनों का जिस्म राख में था बदला
आधे को मिट्टी में गाड़कर
रात की रानी का पौधा लगाना
मुझे रात में कोई ख़ुशबू बनाना
जीवन बेनूर था, मरकर बहक लूँ
वसीयत में यह एक ख़्वाहिश भी रख लूँ
रात की रानी बन खिलूँगी और रात में बरसूँगी
न साँस मैं माँगूँगी, न प्यार को तरसूँगी
भोर में ओस की बूँदों से लिपटी मैं दमकूँगी
दिन में बुझी भी, तो रात में चमकूँगी।
क़ज़ा की बाहों में
जब मेरी सुकून भरी मुस्कुराहट दिखे
समझना मेरे ज़ीस्त की कुछ हसीन कहानी
उसने मुझे सुनाई है
शब के लिए रात की रानी खिलाई है
जीवन में बस एक प्रेम कमाया, वह भी तुम्हारे सहारे
इतना करो कि यह प्रेम कभी न हारे
तुम्हें कसम है, एक वादा तुम करना
मेरी यह वसीयत तुम ज़रूर पूरी करना
तुम्हारे सिवा कौन इसको सँभाले
मेरी यह वसीयत अब तुम्हारे हवाले।
-जेन्नी शबनम (16.11.2020)
(मेरे बच्चों के लिए)
_____________________
शनिवार, 14 नवंबर 2020
696. प्रकाश-पर्व (दीवाली पर 10 हाइकु)
प्रकाश-पर्व
***
1.
धूम-धड़ाका
चारों ओर उजाला
प्रकाश-पर्व।
2.
फूलों-सी सजी
जगमग करती
दीयों की लड़ी।
3.
जगमगाते
चाँद-तारे-से दीये
घोर अमा में।
4.
झूमती गाती
घर-घर में सजी
दीपों की लड़ी।
5.
झिलमिलाता
अमावस की रात
नन्हा दीपक।
6.
फुलझड़ियाँ
पटाखे और दीये
गप्पे मारते।
7.
दीवाली बोली-
दूर भाग अँधेरे!
दीया है जला।
8.
रोशनी खिली
अँधेरा हुआ दुःखी
किधर जाए।
9.
दीया जो जला
सरपट दौड़ता
तिमिर भागा।
10.
रिश्ते महके
दीयों संग दमके
दीवाली आई।
-जेन्नी शबनम (14.11.2020)
_____________________
मंगलवार, 10 नवंबर 2020
695. जिया करो (तुकांत)
जिया करो
*******
सपनों के गाँव में, तुम रहा करो
किस्त-किस्त में न, तुम जिया करो।
संभावनाओं भरा, ये शहर है
ज़रा आँखें खुली, तुम रखा करो।
कब कौन किस वेष में, छल करे
ज़रा सोच के ही, तुम मिला करो।
हैं ढेरों झमेले, यहाँ पे पसरे
ज़रा सँभल के ही, तुम चला करो।
आजकल हर रिश्ते हैं, टूटे बिखरे
ज़रा मिलजुल के ही, तुम रहा करो।
तूफ़ाँ आके, गुज़र न जाए जबतक
ज़रा झुका के सिर, तुम रहा करो।
मतलबपरस्ती से, क्यों है घबराना
ज़रा दुनियादारी, तुम समझा करो।
गुनहगारों की, जमात है यहाँ
ज़रा देखकर ही, तुम मिला करो।
नस-नस में भरा, नफ़रतों का खून
ज़रा-सा आशिक़ी, तुम किया करो।
अँधेरों की महफ़िल, सजी है यहाँ
ज़रा रोशनी बन, तुम बिखरा करो।
रात की चादर पसरी है, हर तरफ़
ज़रा दीया बनके, तुम जला करो।
कौन क्या सोचता है, न सोचो 'शब'
जीभरकर जीवन अब, तुम जिया करो।
- जेन्नी शबनम (10. 11. 2020)
____________________
रविवार, 8 नवंबर 2020
694. हम (11 हाइकु) प्रवासी मन - 119, 120
हम
*******
1.
चाहता मन-
काश पंख जो होते
उड़ते हम।
2.
जल के स्रोत
कण-कण से फूटे
प्यासे हैं हम।
3.
पेट मे आग
पर जलता मन,
चकित हम।
4.
हमसे जन्मी
मंदिर की प्रतिमा,
हम ही बुरे।
5.
बहता रहा
आँसुओं का दरिया
हम ही डूबे।
6.
कोई न सगा
ये कैसी है दुनिया?
ठगाए हम।
7.
हमने ही दी
सबूत व गवाही,
इतिहास मैं।
8.
यायावर थी,
शब्दों में अब मिली,
पनाह मुझे।
9.
मिला है शाप,
अभिशापित हम
किया न पाप।
10.
अकेले चले
सूरज-से जलते
जन्मों से हम।
11.
अड़े ही रहे
आँधियों में अडिग
हम हैं दूब।
- जेन्नी शबनम (7. 11. 2020)
_____________________
मंगलवार, 3 नवंबर 2020
693. कपट
कपट
***
हाँ कपट ही तो है
सत्य से भागना, सत्य न कहना, पलायन करना
पर यह भी सच है, सत्य की राह में
बखेड़ों के मेले हैं, झमेलों के रेले हैं
कोई कैसे कहे सारे सत्य, जो दफ़्न हो सीने में
उम्र की थकान के, मन के अरमान के
सदियों-सदियों से, युगों-युगों से।
यों तो मिलते हैं कई मुसाफ़िर
दो पल ठहरकर राज़ पूछते हैं
दमभर को अपना कहते, फिर चले जाते हैं
उम्मीद तोड़ जाते हैं, राह पर छोड़ जाते हैं।
काश! कोई तो थम जाता, छोड़कर न जाता
मन की यायावरी को एक ठौर दे जाता।
ये कपट, ये भटकाव मन को नहीं भाते हैं
पर इनसे बच भी कहाँ पाते हैं
यों हँसी में हर राज़ दफ़्न हो जाते हैं
फिर कहना क्या और पूछना क्या, सब बेमानी है
ऐसे ही बीत जाता है, सम्पूर्ण जीवन
किसी की आस में, ठहराव की उम्मीद में।
हम सब इसी राह के मुसाफ़िर, मत पूछो सत्य
गर कोई जान न सके, बिन कहे पहचान न सके
यह उसकी कमी है
सत्य तो प्रगट है, कहा नहीं जाता, समझा जाता है
फिर भी लोग इसरार करते हैं।
सत्य को शब्द न दें, हँसकर टाल दें, तो कपटी कहते हैं
ठीक ही कहते हैं वे, हम कपटी हैं, कपटी!
-जेन्नी शबनम (3.11.2020)
____________________
शनिवार, 24 अक्टूबर 2020
692. दड़बा
दड़बा
***
ऐ लड़कियों!
तुम सब जाओ, अपने-अपने दड़बे में
अपने-अपने परों को सँभालो
एक दूसरे को अपनी-अपनी चोंच से लहूलुहान करो।
कटना तो तुम सबको है, एक-न-एक दिन
अपनों द्वारा या ग़ैरों द्वारा
सीख लो लड़ना
ख़ुद को बचाना
दूसरों को मात देना
तुम सीखो छल-प्रपंच और प्रहार-प्रतिघात
तुम सीखो द्वंद्ववाद और द्वंद्वयुद्ध।
दड़बे के बाहर की दुनिया
क़ातिलों से भरी है
जिनके पास शब्द के भाले हैं
बोली की कटारें हैं
जिनके देह और जिह्वा को
तुम्हारे मांस और लहू की प्यास है
पलक झपकते ही झपट ली जाओगी
चीख भी न पाओगी।
दड़बे के भीतर, कितना भी लिख लो तुम
बहादुरी की गाथाएँ, हौसलों की कथाएँ
पर बाहर की दुनिया, जहाँ पग-पग पर भेड़िए हैं
जो मानव-रूप धरकर, तुम्हारा इन्तिज़ार कर रहे हैं
भेड़िए के सामने मेमना नहीं, ख़ुद भेड़िया बनना है
टक्कर सामने से देना है, बराबरी पर देना है।
ऐ लड़कियो!
जीवन की रीत, जीवन का संगीत, जीवन का मन्त्र
सब सीख लो तुम
न जाने कब किस घड़ी
समय तुमसे क्या माँगे।
-जेन्नी शबनम (24.10.2020)
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