मंगलवार, 13 मई 2014

456. पैसा (15 हाइकु) पुस्तक 54-56

पैसा 

*******

1.
पैसे ने छीने
रिश्ते नए पुराने
पैसा बेदिल।

2.
पैसा गरजा
ग़ैर बने अपने
रिश्ता बरसा।

3.
पैसे की वर्षा
भावनाएँ घोलता
रिश्ता मिटता।

4.
पैसा कन्हैया
मानव है गोपियाँ
खेल दिखाता।

5.
पैसे का भूखा
भरपेट है खाता,
मरता भूखा।

6.
काठ है रिश्ता 
खोखला कर देता
पैसा दीमक।

7.
ताली पीटता
सबको है नचाता
पैसा घमंडी।

8.
पैसा अभागा
कोई नहीं अपना
नाचता रहा।

9.
पैसा है चंदा
रंग बदले काला
फिर भी भाता।

10.
मन की शांति
लूटकर ले गया
पैसा लुटेरा।

11.
मिला जो पड़ा
चींटियों ने झपटा
पैसा शहद।

12.
गुत्थम-गुत्था
इंसान और पैसा
विजयी पैसा।

13.
बने नशेड़ी
जिसने चखा नशा,
पैसा है नशा।

14.
पैसा ज़हर
सब चाहता खाना
हसीं असर

15.
नाच नचावे 
छन-छन छनके 
हाथ न पैर। (पैसा)
  
- जेन्नी शबनम (29. 4. 2014)
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रविवार, 11 मई 2014

455. अवसाद के क्षण

अवसाद के क्षण

***

अवसाद के क्षण 
वैसे ही लुढ़क जाते हैं 
जैसे कड़क धूप के बाद शाम ढलती है
जैसे अमावास के बाद चाँदनी खिलती है 
जैसे अविरल अश्रु के बहने के बाद 
मन में सहजता उतरती है। 
 
जीवन कठिन है 
मगर इतना भी नहीं कि जीते-जीते थक जाएँ 
और फिर ज्योतिष से 
ग्रहों को अपने पक्ष में करने के उपाय पूछें
या फिर सदा के लिए 
स्वयं को स्वयं में समाहित कर लें। 
 
अवसाद भटकाव की दुविधा नहीं 
न पलायन का मार्ग है 
अवसाद ठहरकर चिन्तन का क्षण है 
स्वयं को समझने का 
स्वयं के साथ रहने का अवसर है। 

हर अवसाद में
एक नए आनन्द की उत्पत्ति सम्भावित है
अतः जीवन का ध्येय  
अवसाद को जीकर आनन्द पाना है। 

-जेन्नी शबनम (11.5.2014)
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गुरुवार, 1 मई 2014

454. शासक (पुस्तक -78)

शासक

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इतनी क्रूरता, कैसे उपजती है तुममें?
कैसे रच देते हो, इतनी आसानी से चक्रव्यूह 
जहाँ तिलमिलाती हैं, विवशताएँ
और गूँजता है अट्टहास
जीत क्या यही है?
किसी को विवश कर
अधीनता स्थापित करना, अपना वर्चस्व दिखाना  
किसी को भय दिखाकर
प्रताड़ित करना, आधिपत्य जताना
और यह साबित करना कि 
तुम्हें जो मिला, तुम्हारी नियति है  
मुझे जो तुम दे रहे, मेरी नियति है 
मेरे ही कर्मों का प्रतिफल 
किसी जन्म की सज़ा है 
मैं निकृष्ट प्राणी  
जन्मों-जन्मो से, भाग्यहीन, शोषित  
जिसे ईश्वर ने संसार में लाया 
ताकि तुम, सुविधानुसार उपभोग करो
क्योंकि तुम शासक हो
सच है-
शासक होना ईश्वर का वरदान है 
शोषित होना ईश्वर का शाप!

- जेन्नी शबनम (1. 5. 2014)
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सोमवार, 28 अप्रैल 2014

453. गुमसुम ये हवा (स्त्री पर 7 हाइकु) पुस्तक 54

गुमसुम ये हवा 

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1.
गाती है गीत
गुमसुम ये हवा
नारी की व्यथा। 

2.
रोज़ सोचती
बदलेगी क़िस्मत
हारी औरत। 

3.
ख़ूब हँसती
ख़ुद को ही कोसती
दर्द ढाँपती। 

4.
रोज़-ब-रोज़
ख़ाक होती ज़िन्दगी
औरत बंदी। 

5.
जीतनी होगी
युगों पुरानी जंग
औरतें जागी। 

6.
बहुत दूर
आसमान ख़्वाबों का
स्त्रियों का सच।  

7. जीत न पाई
ज़िन्दगी की लड़ाई
मौन स्वीकार। 

- जेन्नी शबनम (8. 3. 2014)
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शुक्रवार, 25 अप्रैल 2014

452. बहुरुपिया (5 ताँका)

बहुरुपिया 
(5 ताँका)

***

1.
हवाई यात्रा
करता ही रहता
मेरा सपना
न पहुँचा ही कहीं
न रुकता ही कभी। 

2.
बहुरुपिया
कई रूप दिखाए
सच छुपाए
भीतर में जलता
जाने कितना लावा। 

3.
कभी न जला
अंतस् बसा रावण
बड़ा कठोर
हर साल जलाया
झुलस भी न पाया। 

4.
कहीं डँसे न
मानव-केंचुल में
छुपे हैं नाग
मीठी बोली बोलके
करें विष-वमन। 

5.
साथ हमारा 
धरा-नभ का नाता  
मिलते नहीं  
मगर यूँ लगता-
आलिंगनबद्ध हों। 

-जेन्नी शबनम (16.4.2014)
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रविवार, 20 अप्रैल 2014

451. मतलब

मतलब

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छोटे-छोटे दुःख सुनना
न मुझे पसंद है न तुम्हें
यूँ तुमने कभी मना नहीं किया कि न बताऊँ 
पर जिस अनमने भाव से सब सुनते हो 
समझ आ जाता है कि तुमको पसंद नहीं आ रहा 
हमारे बीच ऐसा अनऔपचारिक रिश्ता है कि
हम कुछ भी किसी को बताने से मना नहीं करते 
परन्तु 
सिर्फ़ कहने भर को कहते हैं 
सुनने भर को सुनते हैं
न जानना चाहते हैं, न समझना चाहते हैं    
हम कोई मतलब नहीं रखते
एक दूसरे के 
सुख से, दुःख से, ज़िन्दगी से, फ़ितरत से 
बस एक कोई गाँठ है 
जो जोड़े हुए है 
जो टूटती नहीं 
शायद इस लिए हम जुड़े हुए हैं 
अपना-अपना मतलब साध रहे हैं। 

- जेन्नी शबनम (20. 4. 2014)
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गुरुवार, 17 अप्रैल 2014

450. चाँद-चाँदनी (चाँद पर 7 हाइकु) पुस्तक 53,54

चाँद-चाँदनी

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1.
तप करता
श्मशान में रात को
अघोरी चाँद। !

2.
चाँद न आया
इंतज़ार करती
रात परेशाँ। 

3.
वादाख़िलाफ़ी
चाँद ने की आज भी  
फिर न आया। 

4.
ख़्वाबों में आई
दबे पाँव चाँदनी
बरगलाने।

5.
तमाम रात
आँधियाँ चलीं, पर
चाँद न उड़ा।

6.
पूरनमासी
जिनगी में है लाई
पी का सनेस।

7.
नशे में धुत्त
लड़खड़ाता चाँद
झील में डूबा।

- जेन्नी शबनम (11. 4. 2014)
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शुक्रवार, 11 अप्रैल 2014

449. समय-रथ (समय पर 4 हाइकु) पुस्तक 53

समय-रथ 

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1.
रोके न रुके 
अपनी चाल चले 
समय-रथ। 

2.
न देख पीछे 
सब अपने छूटे
यही है सच। 

3.  
नहीं फूटता 
सदा भरा रहता
दुःखों का घट।   

4.
स्वीकार किया 
ज़िन्दगी से जो मिला 
नहीं शिकवा। 

- जेन्नी शबनम (24. 3. 2014)
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शनिवार, 5 अप्रैल 2014

448. पात झरे यूँ (पतझर पर 10 हाइकु) पुस्तक 52,53

पात झरे यूँ 

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1.
पात झरे यूँ 
तितर-बितर ज्यूँ 
चाँदनी गिरे।

2.
पतझर ने 
छीन लिए लिबास
गाछ उदास

3.
शैतान हवा
वृक्ष की हरीतिमा
ले गई उड़ा

4.
सूनी है डाली
चिड़िया न तितली
आँधी ले उड़ी।

5.
ख़ुशी बिफरी 
मन में पतझर
उदासी फैली

6.
खुशियाँ झरी
जिन्दगी की शाख़ से
ज्यों पतझर।

7.
काश मैं होती
गुलमोहर जैसी
बेपरवाह।

8.
फिर खिलेगी
मौसम कह गया
सूनी बगिया।

9.
न रोको कभी
आकर जाएँगे ही
मौसम सभी।

10.
जिन्दगी ऐसी
पतझर के बाद
वीरानी जैसी।

- जेन्नी शबनम (4. 4. 2014)
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मंगलवार, 18 मार्च 2014

447. कुछ ख़त

कुछ ख़त

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मुद्दतों बाद तेरा ख़त मिला
जिसपर तुम्हारा पता नहीं
रोशनाई ज़रा-ज़रा पसरी हुई 
हर्फ़ ज़रा-ज़रा भटके हुए
तुमने प्यार लिखा, दर्द भी और मेरी रुसवाई भी 
तेरे ख़त में तेरे-मेरे दर्द पिन्हा हैं 
हयात के ज़ख़्म हैं, थोड़े तेरे थोड़े मेरे 
तेरे ख़त को हाथों में लिए 
तेरे लम्स को महसूस करते हुए  
मेरी पुरनम आँखें 
धुँधले हर्फों से तेरा अक्स तराशती हैं  
हयात का हिसाब लगाती हैं  
वज़ह ढूँढ़ती हैं  
क्यों कतरा-कतरा हँसी  
वक़्त की दीवारों में चुन दी गई  
क्यों सुकून को देश निकाला मिला 
आज भी यादों में बसी वो एक शब
तमाम यादों पर भारी है 
जब 
सोचे समझे फ़ैसले की तामील का आख़िरी पहर था  
एक को धरती दूजे को ध्रुवतारा बन जाना था 
ठीक उसी वक़्त 
वक़्त ने पंजा मारा 
देखो! वक़्त के नाखूनों में  
हमारे दिल के 
खुरचे हुए कच्चे मांस और ताज़ा लहू
अब भी जमे हुए हैं
सच है, कोई फ़र्क़ नहीं   
वक़्त और दैत्य में 
देखो! हमारे दरम्यान खड़ी वक़्त की दीवार 
सफ़ेद चूने से पुती हुई है
जिसपर हमारे किस्से खुदे हुए हैं 
और आज तुम्हारे इस ख़त को भी 
उस पर चस्पा हो जाना है
जिसके जवाब तुम्हें चाहिए ही नहीं 
मालूम है, कुछ ख़त  
जवाब पाने के लिए
लिखे भी नहीं जाते। 
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पिन्हा - छुपा हुआ
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- जेन्नी शबनम (18. 3. 2014)
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446. फगुआ रंग (होली पर 7 हाइकु) पुस्तक 51, 52

फगुआ रंग 

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1.
फगुआ रंग
मन हुआ मलंग
गाए तरंग।

2.
चटख रंग
अंग-अंग में लगे
मन बहके

3.
हवाएँ झूमी   
आसमान ने फेंके 
रंग गुलाबी। 

4.
बिखर गई
छटा इन्द्रधनुषी 
होली का दिन।  

5.
मन चहका 
देख के रंग पक्का 
चढ़ा फगुआ। 

6.
कैसी ये होली 
तक़दीर ने खेली 
छाई उदासी। 

7.
हुई बावरी 
भरके पिचकारी 
पिया पे डारी। 

- जेन्नी शबनम (15. 3. 2014)
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शनिवार, 8 मार्च 2014

445. किसे लानत भेजूँ

किसे लानत भेजूँ

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किस एहसास को जीऊँ आज?
ख़ुद को बधाई दूँ 
या लानत भेजूँ उन सबको 
जो औरत होने पर गुमान करती हैं  
और सबसे छुपकर हर रोज़ 
पलायन के नए-नए तरीक़े सोचती हैं 
जिससे हो सके जीवन का सुनिश्चित अन्त  
जो आज ख़ुद के लिए तोहफ़े खरीदती हैं 
और बड़े नाज़ से 
आज काम न करने का हक़ जताती हैं। 
  
कभी अधिकार के लिए हुए जंग में     
औरतों को मिला एक दिन हक़ में    
दुनिया की हुकूमतों ने  
एक दिन हम औरतों के नाम कर  
मुट्ठी में कर ली हमारी आज़ादी
हम औरतें हार गईं
हमारी क़ौम हार गई 
एक दिन के नाम पर 
हमारी साँसें छीन ली गईं। 

किसे लानत भेजूँ?
मैं ख़ुद को लानत भेजती हूँ 
क्यों लगाती हूँ गुहार 
एक दिन हम औरतों के लिए 
जबकि जानती हूँ 
आज भी कितनी स्त्रियों का जिस्म 
लूटेगा, पिटेगा, जलेगा, कटेगा  
गुप्तांगों को चीरकर 
कोई हैवान रक्त-पान करेगा
चीख निकले तो ज़ुबान काट दी जाएगी 
और बदन के टुकड़े 
कचरे के ढेर पर मिलेगा।  

धोखे से बच्चियों को कोठे पर बेचा जाएगा 
जहाँ उसका जिस्म ही नहीं मन भी हारेगा 
वह अबोध समझ भी न पाएगी
यह क्या हो रहा है 
क्यों उसकी क़िस्मत में दर्द ही दर्द लिखा है?

बस एक दिन का जश्न 
फिर एक साल का प्रश्न 
जिसका नहीं है कोई जवाब 
न हमारे पास 
न हुक्मरानों के पास।  

सब जानते हुए भी हम औरतें 
हम औरतें जश्न मनाती हैं  
बस एक दिन ही सही 
हम ग़ुलाम औरतों के नाम।  

- जेन्नी शबनम (मार्च 8, 2014)
(अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर)
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रविवार, 2 मार्च 2014

444. थम ही जा

थम ही जा

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जैसे-जैसै मन सिकुड़ता गया
जिस्म और ज़रुरतें भी सिकुड़ती गईं
ऐसा नहीं कि कोई चाह नहीं
पर हर चाह को समेटना, रीत जो थी
मन की वीणा तोड़नी ही थी
मूँदी आँखो के सपने
जागती आँखों से मिटाने ही थे
क्या-क्या लेकर आए थे
क्या-क्या गँवाया
सारे हिसाब, मन में चुपचाप होते रहे 
कितने मौसम अपने, कितने आँसू ग़ैरों से
सारे क़िस्से, मन में चुपचाप कहते रहे 
साँसों की लय से
हर रोज़ गुज़ारिश होती- 
थम-थम के चल
बस अब, थम ही जा। 

- जेन्नी शबनम (2. 3. 2014)
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शनिवार, 8 फ़रवरी 2014

443. बेपरवाह मौसम

बेपरवाह मौसम

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कुछ मौसम   
जाने कितने बेपरवाह हुआ करते हैं   
बिना हाल पूछे, चुपके से गुज़र जाते हैं   
भले ही मैं उसकी ज़रूरतमंद होऊँ   
भले ही मैं आहत होऊँ,   
कुछ मौसम   
शूल से चुभ जाते हैं 
और मन की देहरी पर 
साँकल-से लटक जाते हैं   
हवा के हर एक हल्के झोंके से   
साँकल बज उठती है   
जैसे याद दिलाती हो, कहीं कोई नहीं,   
दूर तक फैले बियाबान में   
जैसे बिन मौसम बरसात शुरू हो   
कुछ वैसे ही   
मौसम की चेतावनी   
मन की घबराहट और कुछ पीर   
आँखों से बह जाती हैं   
कुछ ज़ख़्म और गहरे हो जाते हैं,   
फिर सन्नाटा   
जैसे हवाओं ने सदा के लिए   
अपना रुख़ मोड़ लिया हो   
और जिसे इधर देखना भी   
अब गँवारा नहीं।   

- जेन्नी शबनम (8. 2. 2014) 
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गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014

442. वसंत ऋतु (वसंत ऋतु पर 4 हाइकु) पुस्तक - 51

वसंत ऋतु

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1.
हवा बसंती 
उड़ाकर ले गई 
सोच ठिठुरी।  

2. 
बसंती फूल 
चहुँ ओर हैं खिले 
ऋतु ने दिए।  

3. 
वसंत आया
ठंड से था सिकुड़ा
तिमिर भागा। 

4.
उजले पीले
बसंत ने बिखेरे  
रंग अनोखे। 

- जेन्नी शबनम (4. 2. 2014)
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मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

441. हे श्वेताम्बरा (सरस्वती पूजा पर 3 हाइकु) पुस्तक - 50

हे श्वेताम्बरा  

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1.
ज्ञान विवेक,
हे श्वेताम्बरा आओ
जगत को दो। 

2.
पीली धरती
अगवानी करती
माँ शारदा की। 

3.
ज्ञान का वर 
देती विद्यादायिनी 
हंसवाहिनी। 

- जेन्नी शबनम (3. 2. 2014)
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गुरुवार, 30 जनवरी 2014

440. तेज़ाब की नदी (पुस्तक 102)

तेज़ाब की नदी

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मैं तेज़ाब की एक नदी हूँ 
पल-पल में सौ-सौ बार 
ख़ुद ही जली हूँ
अपनी आँखों से, अनवरत बहती हुई
अपना ही लहू पीती हूँ 
जब-जब मेरी लहरें उफनकर 
निर्बाध बहती हैं 
मैं तड़पकर, सागर की बाहों में समाती हूँ 
फूल और मिट्टी, डर से काँपते हैं 
कहीं जला न दूँ, दुआ माँगते हैं 
मेरे अट्टहास से दसो दिशाएँ चौकन्नी रहती हैं   
तेज़ाब क्या जाने 
उत्तर में देवता होते हैं
आसमान में स्वर्ग है 
धरती के बहुत नीचे नरक है 
तेज़ाब को अपने रहस्य मालूम नहीं 
बस इतना मालूम है 
जहाँ-जहाँ से गुज़रना है, राख कर देना है
अकसर, चिंगारियों से खेलती हुई 
मैं ख़ुद को भी नहीं रोक पाती हूँ  
अथाह जल, मुझे निगल जाता है 
मेरी लहरों के दीवाने 
तबाही का मंज़र देखते हैं 
और मेरी लहरें 
न हिसाब माँगती है 
न हिसाब देती है। 

- जेन्नी शबनम (30. 1. 2014)
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शुक्रवार, 24 जनवरी 2014

439. निर्लज्जता

निर्लज्जता

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स्वीकार है मुझे 
मेरी निर्लज्जता
आज दिखाया है भरी भीड़ को मैंने
अपने वो सारे अंग
जिसे छुपाया था जन्म से अब तक, 
सीख मिली थी-
हमारा जिस्म
हमारा वतन है और मज़हब भी
जिसे साँसें देकर बचाना
हमारा फ़र्ज़ है और हमारा धर्म भी,
जिसे कल
कुछ मादा-भक्षियों ने
कुतर-कुतर कर खाया था
और नोच खसोटकर
अंग-अंग में ज़हर ठूँसा था,
जानती हूँ
भरी भीड़ न सबूत देगी
न कोई गवाह होगा
मुझपर ही सारा इल्ज़ाम होगा
यह भी मुमकिन है
मेरे लिए कल का सूरज कभी न उगे
मेरे जिस्म का ज़हर
मेरी साँसों को निगल जाए,
इस लिए आज
मैं निर्लज्ज होती हूँ
अपना वतन और मज़हब 
समाज पर वारती हूँ
शायद 
किसी मादा-भक्षी की माँ बहन बेटी की रगों में 
ख़ून दौड़े
और वो काली या दूर्गा बन जाए

- जेन्नी शबनम (24. 1. 2014)
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बुधवार, 22 जनवरी 2014

438. उफ़! माया

उफ़! माया

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"मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है... 
मेरा वो सामान लौटा दो...!"
'इजाज़त' की 'माया',
उफ़ माया!
तुम्हारा सामान लौटा कि नहीं, नहीं मालूम 
मगर तुम लौट गई, इतना मालूम है 
पर मैं?
मेरा तो सारा सामान...!
क्या-क्या कहूँ लौटाने
मेरा वक़्त, मेरे वक़्त की उम्र 
वक़्त के घाव, वक़्त के मलहम 
दिन-रात की आशनाई 
भोर की लालिमा, साँझ का सूनापन 
शब के अँधियारे, दिन के उजाले 
रोज़ की इबादत, सपनों की हकीकत
हवा की नरमी, धूप की गरमी 
साँसों की कम्पन, अधरों के चुम्बन 
होंठों की मुस्कान, दिल नादान 
सुख-दुःख, नेह-देह...!
सब तुम्हारा, सब के सब तुम्हारा 
अपना सब तो उस एक घड़ी सौंप दिया 
जब तुम्हें ख़ुदा माना 
इनकी वापसी...?
फिर मैं कहाँ? क्या वहाँ?
जहाँ तुम हो माया?

- जेन्नी शबनम (22. 1. 2014)
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सोमवार, 20 जनवरी 2014

437. पूर्ण विराम (क्षणिका)

पूर्ण विराम

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एक पूरा वजूद, धीमे-धीमे जलकर 
राख़ में बदलके चेतावनी देता- 
यही है अंत, सबका अंत
मुफ़लिसी में जियो या करोड़ों बनाओ
चरित्र गँवाओ या तमाम साँसें लिख दो 
इंसानियत के नाम
बस यही पूर्ण विराम, यही है पूर्ण विराम। 

- जेन्नी शबनम (20. 1. 2014)
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मंगलवार, 14 जनवरी 2014

436. पूरा का पूरा (क्षणिका)

पूरा का पूरा 

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तेरे अधूरेपन को अपना पूरा दे आई
यूँ लगा मानो दुनिया पा गई
पर अब जाना तेरा आधा भी तेरा नहीं था  
फिर तू कहाँ समेटता मेरे पूरे 'मैं' को
तूने जड़ दिया मुझे 
मोबाइल के नंबर में पूरा का पूरा

- जेन्नी शबनम (14. 1. 2014)
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मंगलवार, 7 जनवरी 2014

435. जजमेंटल

जजमेंटल

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गुज़रे हो तुम सभी
इसी दौर से कभी
फिर
नई नस्लों के लिए
नई फ़सलों के लिए
क्योंकर एकपक्षीय हो जाते हो
क्यों जजमेंटल हो जाते हो,
यह तो विधि का विधान है
उम्र का रुझान है
निर्धारित क्रिया है
प्रकृति की प्रक्रिया है,
याद करो, तुम भी कभी भटके हो
कामनाओं के जंगल में
जहाँ सब सम्मोहित करता है
चुम्बक-सा खींचता है,
तुम भी चढ़े हो चमकती सीढ़ियों से
आसमान की छत पर
जहाँ मुठ्ठी भर के फ़ासले पर बैठा रहता है चाँद
तुम्हारी ही बाट जोहता हुआ,
तुम्हें भी तो दिखा होगा, रेगिस्तान में फूल ही फूल
कड़कती धूप बाधा नहीं छाया लगती होगी
कई बारिशों ने छुपाई होगी, आँखों की नमी
बेवक़्त दिल रोया होगा
अनजान राहों पे डरा होगा, फिर भी मचला होगा,
उस नदी को भी तैर कर पार किया होगा तुमने
जिसके दूसरे किनारे पर
हाथ के इशारे से कोई बुलाता है
जिसे दुनिया भी देख लेती है
रोकती है, ख़तरे से आगाह कराती है
मगर जान की बाज़ी लगा
तुम भी कूदे होगे और पहुँचे होगे नदी के पार
भ्रम की चमकती आकृतियों के पास
मुमकिन है वो हाथ सच्चा हो
बाद में भले कच्चा हो
या फिर इतना पक्का कि शिलाएँ हार मान जाए
या ये भी मुमकिन दिल तोड़ जाए,
तुमने भी तो गिर-गिरकर सँभलना सीखा
नियत समय को पकड़ना सीखा
बढ़ने दो मुझे भी वक़्त की रफ़्तार के साथ
उगने दो बेमौसम मुझे 
काँटों में से फूल चुनने दो
सारे एहसास मुझे भी खुद करने दो,
मुझे भी नापने दो 
धरती की सीमा
आसमान की ऊँचाई
दिल की गहराई
मन का गुनगुनापन
चाँद की शीतलता
सूर्य की ऊष्णता,
ख़ुद में भरने दो मुझे ख़ुद को
हँसने दो
रोने दो
नाचने दो
गाने दो
उम्र के साथ चलने दो,
बस एक हाथ थामे रहो
ताकि हौसला न मिटे, जब दिल टूटे,
अपने आईने में मुझे न परखो
मेरे आईने में मुझे देखो
अपने अनुभव के पिटारे से
उपदेश नहीं संदेश निकालो,
संदेह करो मगर अविश्वास नहीं
बस मेरे लिए जजमेंटल न बनो।

- जेन्नी शबनम (7. 1. 2014)
(पुत्री परान्तिका के जन्मदिन पर)
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शनिवार, 4 जनवरी 2014

434. आँचल में मौसम

आँचल में मौसम

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तमाम रास्ते बिखरे पत्ते
सूखे चरमराते हुए 
अपने अंत की कहानी कह रहे थे  
मुर्झाए फूल अपनी शाख से गिरकर 
अपनी निरर्थकता को कोस रहे थे 
उस राह से गुज़रते हुए 
न जाने क्यों 
कुछ मुर्झाए फूल और पत्ते बटोर लिए मैंने 
''हर जीवन का हश्र यही''
सोचते-सोचते न जाने कब  
अपने आँचल की छोर में बँधी  
मौसम की पर्ची मैंने हवा में उड़ा दी  
वृक्ष पर अड़े पत्ते मुस्कुरा उठे 
फूल की डालियों पर फूल नाच उठे 
बौराई तितलियाँ मंडराने लगी 
और मैं चलते-चलते 
उस गर्म पानी के झील तक जा पहुँची 
जहाँ अंतिम बार 
तुमसे अलग होने से पहले  
तुम्हारे आलिंगन में मैं रोई थी 
तुमने चुप कराते हुए कहा था- 
''हम कायर नहीं, कभी रोना मत, 
यही हमारी तक़दीर, सब स्वीकार करो''
और तुम दबे पाँव चले गए
मैं धीमे-धीमे ज़मीन पर बैठ गई 
जाते हुए भी न देखा तुम्हें 
क्योंकि मैं कायर थी, रो रही थी 
पर अब 
अपने आँचल में मौसम बाँध रखी हूँ 
अब रोना छोड़ चुकी हूँ 
"अब मैं कायर नहीं!"

- जेन्नी शबनम (4. 1. 2014)
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शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

433. ये साल नया (नव वर्ष पर 6 हाइकु) पुस्तक 50

ये साल नया

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1.
सौग़ात लाया
झोली में भरकर,
ये साल नया

2.
अतीत छुपा,
नए साल का देख
पिटारा नया

3.
फिर से खिली
उम्मीदों वाली धूप,
नए साल की


4.
मधुर आभा
छन-छन के आई,
नई भोर में

5.
लिपट गई
अतीत की चादर,
बिछड़ा साल

6.
कुंडी खड़की
स्वागत में खड़ा था, 
नूतन वर्ष। 

- जेन्नी शबनम (1. 1. 2014)
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मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

432. अतीत के पन्ने (चोका - 6)

अतीत के पन्ने   

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याद दिलाए 
अतीत के जो पन्ने  
फड़फड़ाए
खट्टी-मीठी-सी यादें
पन्नों से झरे  
इधर-उधर को
बिखर गए
टुकड़ों-टुकड़ों में,
हर मौसम
एक-एक टुकड़ा
यादें जोड़ता
मन को टटोलता
याद दिलाता
गुज़रा हुआ पल
क़िस्सा बताता,
दो छोर का जुड़ाव
नासमझी से
समझ की परिधि
होश उड़ाए
अतीत को सँजोए,
बचपन का 
मासूम वक़्त प्यारा
सबसे न्यारा 
सबका है दुलारा, 
जुनूनी युवा
ज़रा मस्तमौला-सा
आँखों में भावी 
बिन्दास है बहुत, 
प्रौढ़ मौसम
ओस में है जलता
झील गहरा
ज़रा-ज़रा सा डर
जोशो-जुनून
चेतावनी-सा देता,
वृद्ध जीवन
कर देता व्याकुल
हरता चैन 
मन होता बेचैन
जीने की चाह
कभी मरती नहीं
अशक्त काया
मगर मोह-माया
अवलोकन
गुज़रे अतीत का
कोई जुगत
जवानी को लौटाए
बैरंग लौटे
उफ़्फ़ मुआ बुढ़ापा
अधूरे ख़्वाब
सब हो जाए पूर्ण
कुछ न हो अपूर्ण !

- जेन्नी शबनम (26. 12. 2013)
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सोमवार, 23 दिसंबर 2013

431. मन (10 हाइकु) पुस्तक 49,50

मन 

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1.
मन में बसी
धूप सीली-सीली-सी
ठंडी-ठंडी सी।

2.
भटका मन
सवालों का जंगल
सब है मौन।

3.
शाख से टूटे
उदासी के ये फूल
मन में गिरे।

4.
बता सबब
अपने खिलने का,
ओ मेरे मन

5.
मन के भाव
मन में ही रहते
किसे कहते?

6.
मन पे छाया
यादों का घना साया,
ख़ूब सताया।

7.
कच्चा-सा मन
जाने कैसे है जला
अधपका-सा।

8.
सोच का मेला
ये मन अलबेला
रातों जागता।

9.
यादों का पंछी
डाल-डाल फुदके
मन बौराए।

10.
धीरज पगी
मादक-सी मुस्कान
मन को खींचे

- जेन्नी शबनम (13. 12. 2013)
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गुरुवार, 19 दिसंबर 2013

430. प्रीत (7 हाइकु) पुस्तक - 48, 49

प्रीत

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1.
प्रीत की डोरी
ख़ुद ही थी जो बाँधी
ख़ुद ही तोड़ी।

2.
प्रीत रुलाए
मन को भरमाए
पर टूटे न।

3.
प्रीत की राह
बस काँटे ही काँटे
पर चुभें न।

4.
प्रीत निराली
सूरज-सी चमके
कभी न ऊबे।

5.
प्रीत की भाषा,
उसकी परिभाषा
प्रीत ही जाने।

6.
प्रीत औघड़
जिसपे मंत्र फूँके
वह न बचे।

7.
प्रीत उपजे
जाने ये कैसी माटी
खाद न पानी ।

- जेन्नी शबनम (8. 12. 2013)
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शुक्रवार, 13 दिसंबर 2013

429. फिर आता नहीं

फिर आता नहीं

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जाने कब आएगा, मेरा वक़्त   
जब पंख मेरे और परवाज़ मेरी   
दुनिया की सारी सौग़ात मेरी   
फूलों की खुशबू, तारों की छतरी   
मेरे अँगने में खिली रहे, सदा चाँदनी   

वो कोई सुबह   
जब आँखों के आगे कोई धुँध न हो   
वो कोई रात, जो अँधेरी मगर काली न हो   
साँसों में ज़रा-सी थकावट नहीं   
पैरों में कोई बेड़ी नहीं   
उड़ती पतंगों-सी, गगन को छू लूँ   
जब चाहे हवा से बातें करूँ   
नदियों के संग बहती रहूँ   
झीलों में डुबकी, मन भर लेती रहूँ   
चुन-चुनकर, ख़्वाब सजाती रहूँ   
सारे ख़्वाब हों, सुनहरे-सुनहरे   
शहद की चाशनी में पके, मीठे गुलगुले-से  

धक् से, दिल धड़क गया   
सपने में देखा, उसने मुझसे कहा-   
तुम्हारा वक़्त कल आएगा   
लम्हा भर भी सोना नहीं   
हाथ बढ़ाकर पकड़ लेना झट से   
खींचकर चिपका लेना कलेजे से   
मंदी का समय है, सब झपटने को आतुर   
चूकना नहीं   
गया वक़्त फिर आता नहीं   

- जेन्नी शबनम (13. 12. 2013) 
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बुधवार, 11 दिसंबर 2013

428. ज़िन्दगी की उम्र (पुस्तक - 97)

ज़िन्दगी की उम्र

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लौट आने की ज़िद, अब न करो
यही मुनासिब है, क्योंकि
कुछ रास्ते वापसी के लिए बनते ही नहीं हैं, 
इन राहों पर जाने की
पहली और आख़िरी शर्त है कि
जैसे-जैसे क़दम आगे बढ़ेंगे
पीछे के रास्ते, सदा के लिए ख़त्म होते जाएँगे
हथेली में चाँदनी रखो
तो जलकर राख बन जाएँगे,
तुम्हें याद तो होगा
कितनी दफ़ा ताकीद किया था तुम्हें 
मत जाना, न मुझे जाने देना
उन राहों पर कभी 
क्योंकि, यहाँ से वापसी 
मृत्यु-सी नामुमकिन है 
बस एक फ़र्क़ है
मृत्यु सारी तकलीफ़ों से निजात दिलाती है
तो इन राहों पर तकलीफ़ों की इंतहा है
परन्तु, मुझपर भरोसे की कमी थी शायद  
या तुम्हारा अहंकार
या तुम्हें ख़ुद पर यक़ीन नहीं था 
धकेल ही दिया मुझे, उस काली अँधेरी राह पर
और ख़ुद जा गिरे, ऐसी ही एक राह पर
अब तो बस
यही ज़िन्दगी है
यादों की ख़ुशबू से लिपटी
राह के काँटों से लहूलुहान
मालूम है मुझे 
मेरी हथेली पर जितनी राख है
तुम्हारी हथेली पर भी उतनी ही है
मेरे पाँव में जितने छाले हैं
तुम्हारे पाँव में भी उतने हैं,
अब न पाँव रुकेंगे
न ज़ख़्म भरेंगे
न दिन फिरेंगे
अंतहीन दर्द, अनगिनत साँसें, छटपटाहट
मगर, वापसी नामुमकिन
काश!
सपनों की उम्र की तरह
ज़िन्दगी की उम्र होती!

- जेन्नी शबनम (11. 12. 2013)
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