गुरुवार, 19 मार्च 2009

38. हम अब भी जीते हैं (तुकान्त)

हम अब भी जीते हैं

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इश्क़ की हद, पूछते हैं आप बारहा हमसे
क्या पता, हम तो हर सरहदों के पार जीते हैं  

इश्क़ की रस्म से अनजान, आप भी तो नहीं
क्या कहें, हम कहाँ कभी ख़्वाबों में जीते हैं  

इश्क़ की इंतिहा, देख लीजिए आप भी
क्या हुआ गर, जो हम फिर भी जीते हैं  

इश्क़ में मिट जाने का, 'शब' और क्या अंदाज़ हो
क्या ये कम नहीं, कि हम अब भी जीते हैं  

- जेन्नी शबनम (19. 3. 2009)
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37. ख़ुद को बचा लाई हूँ (क्षणिका)

ख़ुद को बचा लाई हूँ 

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कुछ टुकड़े हैं अतीत के
रेहन रख आई हूँ, ख़ुद को बचा लाई हूँ  
साबुत माँगते हो, मुझसे मुझको
लो सँभाल लो अब, ख़ुद को जितना बचा पाई हूँ  

- जेन्नी शबनम (18. 3. 2009)
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रविवार, 8 मार्च 2009

36. एक गीत तुम गाओ न

एक गीत तुम गाओ न

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एक गीत तुम गाओ न!
एक ऐसा गीत गाओ कि -
मेरे पाँव उठ चल पड़े, घायल पड़े हैं कब से
हाथों में ताक़त आ जाए, छीन लिए गए हैं बल से
पंख फिर उग जाए, कतर दिए गए हैं छल से
सपनों को ज़मीं मिल जाए, उजाड़े गए हैं सदियों से
आत्मा जी जाए, मारी गई हैं युगों से। 

तुम गाओगे न ऐसा गीत?
एक ऐसा गीत ज़रूर गाना!

मैं रहूँ न रहूँ
पर तुम्हारे गीत से जब भी कोई जी उठे -
मैं उसके मन में जन्मूँगी
तुम्हारे गीत गुनगुनाऊँगी
स्वछंद आकाश में उडूँगी
प्रेम का जहान बसाऊँगी
युगों से बेजान थी, सदियों तक जीऊँगी। 

तुम गाओगे न ऐसा एक गीत?
मेरे लिए गा दो न एक गीत! 

- जेन्नी शबनम (8. 3. 2009)
(अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर)
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35. कल रात (पुस्तक - लम्हों का सफ़र - 29)

कल रात

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कल तमाम रात
मैंने तुमसे बातें की थी 

तुम सुनो कि न सुनो, ये मैंने सोचा नहीं
तुम जवाब न दोगे, ये भी मैंने सोचा नहीं,
तुम मेरे पास न थे, तुम मेरे साथ तो थे 

कल हमारे साथ, रात भी जागी थी
वक़्त भी जागा, और रूह भी जागी थी,
कल तमाम रात, मैंने तुमसे बातें की थी। 

कितना ख़ुशगवार मौसम था
रात की स्याह चादर में
चाँदनी लिपट आई थी
और तारे खिल गए थे। 

हमारी रूहों के बीच
ख़यालों का काफ़िला था
सवालों जवाबों की लम्बी फ़ेहरिस्त थी
चाहतों की, लम्बी क़तार थी। 

तुम्हारे शब्द ख़ामोश थे
तुम सुन रहे थे न
जो मैंने तुमसे कहा था!

तुम्हें हो कि न हो याद
पर, मेरे तसव्वुर में बस गई
कल की हमारी हर बात
कल की हमारी रात। 

कल तमाम रात
मैंने तुमसे बातें की थी। 

- जेन्नी शबनम (1. 3. 2009)
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34. कुछ पता नहीं

कुछ पता नहीं

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बेइंतिहा जीने के जुनून में
ज़िन्दगी कब कहाँ छूट गई
कुछ होश नहीं।   

कारवाँ आता रहा, जाता रहा
कोई अपना, कब बिछुड़ा
कुछ ख़बर नहीं।   

न मेरी ज़िद की बात थी, न तुम्हारी ज़िद की
ज़िन्दगी कब, ज़िल्लत बन गई
कुछ समझ नहीं।   

सागर के दो किनारों की तरह
ज़िन्दगी बँट गई
रोक सकूँ, दम नहीं।    

तूफ़ानों की गर्द
हमारे दिलों में, कब बस गई
हमें एहसास भी नहीं।   

हम भटक गए, कब, क्यों, भटक गए
कोई अंदाज़ा नहीं
कुछ पता नहीं।   

ज़िन्दगी रूठ गई, बस रूठ गई
दर्द है, शिकवा है, ख़ुद से है
कुछ तुमसे नहीं।   

तुम्हें हो कि न हो, मुझे है
गिला है, शिकायत है,
क्या तुम्हें कुछ नहीं?

- जेन्नी शबनम (7. 3. 2009)
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शुक्रवार, 6 मार्च 2009

33. ख़ुशनसीबी की हँसी (क्षणिका)

ख़ुशनसीबी की हँसी 

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चोट जब दिल पर लगती है
एक आह-सी उठती है, एक चिंगारी, दहकती है
चुपके से दिल रोता है और एक हँसी गूँजती है। 
सब पूछते- बहुत ख़ुश हो क्यों?
मैं कहती- ये ख़ुशनसीबी की हँसी है
और चुपचाप एक आँसू दिल में उतरता है।  

- जेन्नी शबनम (नवम्बर 1995)
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रविवार, 1 मार्च 2009

32. अपनी हर बात कही (अनुबन्ध/तुकान्त)

अपनी हर बात कही

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समेट ख़ुद को सीने में उसके, अपने सारे हालात कही
तर कर उसका सीना, अपने मन की बात कही। 

शाया किया अपने सुख-दुःख, उसके ईमान पर
पढ़ ले मेरा हर ग़म, बिना शब्द हर बात कही। 

आस भरी नज़रें उठीं जब, उसकी बाहें थामने को
अपने सीने से लिपटी, ख़ुद से अपनी हर बात कही। 

अच्छा है कोई न जाना, ये मेरा अपना संसार 
आस-पास नहीं है कोई, ख़ुद से अपनी हर बात कही। 

बिन सरोकार सुने क्यों कोई, एक उम्र की बात नहीं
जवाब से परे हर सवाल है, फिर भी अपनी हर बात कही। 

जन्मों का हिसाब है करना, जाने क्या-क्या और है कहना
रोज़ लिपटती, रोज़ सुबकती, 'शब' ख़ुद से ही हर बात कही। 

-जेन्नी शबनम (17. 9. 2008)
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शनिवार, 28 फ़रवरी 2009

31. चुप (क्षणिका)

चुप 

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एक सब्र मन का, उतर गया है आँखों पर
एक सब्र बदन का, ओढ़ लिया है ज़िन्दगी पर
एक चुप पी ली है, अपने होंठों से
एक चुप चुरा ली है, अपनी ज़िन्दगी से  

- जेन्नी शबनम (25. 2. 2009)
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गुरुवार, 26 फ़रवरी 2009

30. लिखूँगी रोज़ मैं एक ख़त

लिखूँगी रोज़ मैं एक ख़त

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लिखूँगी रोज़ मैं एक ख़त
सिर्फ़ तुम्हारे लिए, मेरा ख़त
मेरी स्याही मेरे ज़ख़्मों से रिसती है
जिससे तुम्हारे मन पे मैंने तहरीर रची है  

हर जज़्बात मेरे, कुछ एहसास-ए-बयाँ करते हैं
ज़माना ना समझे, इसीलिए तो तुम्हीं से कहते हैं 
तुम्हारी नज़रें हर हर्फ़ में ख़ुद को तलाश रही हैं 
यकीन है, मेरी हर इबारत तुमसे कुछ कह रही है  

जब कभी मेरे ख़त ना पहुँचे, आँखें नम कर लेना
शायद अब निजात मिली मुझे, सब्र तुम कर लेना 
समझना, मेरी रूह को ज़मानत मिल गई
ख़ुदा से रहम और रिहाई की मंज़ूरी, मुझे मिल गई 

मेरे तुम्हारे बीच, मेरे ख़त ही तो सिर्फ़ एक ज़रिया है
मैं ना रही अब, ये बताने का बस यही एक ज़रिया है 
चाहे जितने तुम पाषाण बनो, थोड़ा तुम्हें भी रुलाना है
नहीं आऊँगी फिर कभी, जश्न मुझे भी तो मनाना है 

मैं फिर भी रोज़ एक ख़त लिखूँगी
चाहे जैसे भी हो तुम तक पहुँचा दूँगी 
ये एक नयी आदत तुम पाल लेना
हवाओं में तैरती मेरी पुकार तुम सुन लेना 
ठंडी बयार जब चुपके से कानों को सहलाए
समझना मैंने तुम्हें अपने ख़त सुनाए  

मेरे हर गुज़रे लम्हे और ख़त अपने सीने में दफ़न कर लेना
सफ़र पूरा कर जब तुम आओ, मुझे उन ख़तों से पहचान लेना 
कभी ख़त जो न लिख पाऊँ, ताकीद तुम करना नहीं
मान लेना पुराना ज़ख़्म पिघला नहीं
और नया ज़ख़्म अभी जमा नहीं  

लिखूँगी रोज़ मैं एक ख़त
सिर्फ़ तुम्हारे लिए मेरा ख़त

- जेन्नी शबनम (16. 9. 2008)
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29. नफ़रत के बीज

नफ़रत के बीज

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नफ़रत के बड़े-बड़े पेड़ उगे हैं, हर कहीं
इन्सान के अलग-अलग रूपों में 
ये बीज हमने कब बोए?

सोचती हूँ -
ख़ुदा ने ज़मीन पर आदम और हव्वा को भेजा
उनके वर्जित फल खाने से इन्सान जन्मा
वह वर्जित फल उन्होंने भूख के लिए खाया होगा
लड़कर आधा-आधा
न कि मनचाही संतान के लिए प्रेम से आधा-आधा। 

शायद उनके बीच जब तीसरा आया 
उन्हें नफ़रत हो गई हो उससे  
इसी नफ़रत के कारण 
इन्सान के चेतन-अचेतन मन में बस गया 
ईर्ष्या, द्वेष, आधिपत्य, बदला, दुश्मनी
हत्या, दुराचार, घृणा, क्रोध, प्रतिशोध। 

नफ़रत की ही इन्तिहा है
जब इसकी हदें इन्सानी रिश्तों को पारकर
सियासत, मुल्कों, क़ौमों तक जा पहुँची। 

पहले बीज से अनगिनत पौधे बनते गए
हर युग में नफ़रत के पेड़ फैलते गए। 

सत्ययुग, द्वापर, त्रेता, कलियुग
ऋषि-मुनि, सदाचारी-दुराचारी, राजा-रंक, देवी-देवता
सुर-असुर, राम-रावण, कृष्ण-कंस, कौरव-पाण्डव 
से लेकर आज तक का जाति, वर्ण और क़ौमी विभाजन
स्त्री-पुरुष का मानसिक विभाजन
दैविक शक्ति से लेकर हथियार
अब परमाणु विभीषिका। 

कैसे कहें कि नफ़रत हमने आज पैदा की 
हमने सदियों-युगों से नफ़रत के बीज को
पौधे से पेड़ बनाया
उन्हें जीवित रहने और जड़ फैलाने में
सहूलियत व मदद दी
जबकि उन्हें जड़ से उखाड़ फेंकना था। 

सोचती हूँ -
ख़ुदा ने आदम और हव्वा में पहले चेतना दी होती
और उस वर्जित फल को खिलाकर
मोहब्बत भरे इन्सान से संसार बसाया होता। 

सोचती हूँ, काश! ऐसा होता। 

- जेन्नी शबनम (14.9.2008)
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28. शाइर

शाइर

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शाइर के अल्फ़ाज़ में
जाने किसकी रूह तड़पती है
हर हर्फ़ में जाने कौन सिसकता है
ख़्वाबों में जाने कौन पनाह लेता है

किसका अफ़साना लिए वो लम्हा-लम्हा जलता है
किसका दर्द वो अपने लफ़्ज़ों में पिरोता है
किसका जीवन वो यादों में पल-पल जीता है

शायद जज़्बाती है, रूहानी है, वो इंसान है
शायद मासूम है, मायूस है, वो बेमिसाल है
इसीलिए तो ग़ैरों के आँसू अपने शब्दों से पोंछता है
और दुनिया का ज़ख़्म सहेजकर शाइर कहलाता है । 

- जेन्नी शबनम (सितम्बर 5, 2008)
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27. मैं आज ग़ज़लों की किताब बनूँगी

मैं आज ग़ज़लों की किताब बनूँगी

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आज मैं कोरा काग़ज़ बनूँगी   
या कैनवास का रूप धरुँगी,   
आज किसी के कलम की स्याही बनूँगी   
या इन्द्रधनुष-सी खिलूँगी,   
आज कोई मुझसे मुझपर अपना गीत लिखेगा   
या मुझसे मुझपर अपना रंग भरेगा,   
आज कोई मुझसे अपना दर्द बाँटेगा   
या मुझपर अपने सपनों का अक्स उकेरेगा,   
आज किसी के नज़्मों में बसूँगी   
या किसी के रूह में पनाह लूँगी,   
आज कोई पुराना नाता पिघलेगा   
या कोई नया ग़म निखरेगा,   
आज किसी पर पहला ज़ुल्म ढाऊँगी,   
या अपना आख़िरी जुर्म करुँगी,   
आज कोई नया इतिहास रचेगा   
या मैं उसके सपने को रँगूँगी,   
आज किसी के दामन में अपनी अंतिम साँस भरूँगी   
या ख़ुद को बहाकर उसके रक्त में जा पसरूँगी,   
आज ख़ुद को बिखराकर ग़ज़लों की किताब बनूँगी   
या आज ख़ुद को रँगकर उस ग्रन्थ को सँवार दूँगी,   
मैं आज ग़ज़लों की किताब बनूँगी!   
मैं आज ग़ज़लों की किताब बनूँगी!   

- जेन्नी शबनम (8. 9. 2008) 
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बुधवार, 25 फ़रवरी 2009

26. ख़ुदा की नाइन्साफ़ी

ख़ुदा की नाइन्साफ़ी 

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ख़ुदा ने बनाए दो इन्सान, स्त्री और मर्द दो जात
सब कुछ बाँटना था आधा-आधा 
जी सकें प्यार से जीवन पूरा
पर ख़ुदा भी तो मर्द जात था, नाइन्साफ़ी कर गया
सुख-दुःख के बँटवारे में, बेईमानी कर गया

जिस्म और ताक़त का मसला
उसके समझ से परे रहा
स्त्री को जिस्म, जज़्बात और बुत बन जाने का नसीब दिया
मर्द को ताक़त, तक़दीर और हुकूमत करने का हक़ दिया

ऐ ख़ुदा! मर्द की इस दुनिया से बाहर निकल
ख़ुदा नहीं, इन्सान बनकर इस जहान को देख। 

क्यों नहीं काँपती रूह तुम्हारी?
जब तुम्हारी बसाई दुनिया की स्त्री बिलखती है
युगों से तड़पती कराह रही है
ख़ामोशी से सिसकती, ज़ख़्म सिलती है

ऐ ख़ुदा! तुम मन्दिर-मस्जिद-गिरिजा में बँटे, आराध्य बने बैठे हो
नासमझों की भीड़ में मूक बने, सदियों से तमाशा देखते हो। 

क्या तुम्हें दर्द नहीं होता?
जब अजन्मी कन्या मरती है
जब नई ब्याहता जलती है
जब नारी की लाज उघड़ती है
जब स्त्री की दुनिया उजड़ती है
जब महिला सवालों की ज़िन्दगी से घबराकर
मौत के गले लगती है

ऐ ख़ुदा! मैं मग़रूर ठहरी, नहीं पूजती तुमको
मेरी न सुनो, कोई बात नहीं 
उनकी तो सुनो, जो तुमसे आस लगाए युगों से पूजते हैं
तुम्हारे सज्दे में करोड़ों सिर झुकते हैं
जो तुम्हारे अस्तित्व की रक्षा में जान लेते और गँवाते हैं

ऐ ख़ुदा! क्या तुम संवेदना-शून्य हो या अस्तित्वहीन हो?
तुम्हारी आस्था में लोग भ्रमित और चेतना-विहीन हो गए हैं
क्या समझूँ, किसे समझाऊँ, किसी को कैसे करवाऊँ 
तुम्हारे पक्षपात और निरंकुशता का भान। 

मेरे मन का द्वंद्व दूर हुआ, समझ गई तुम्हारा रूप
तुम कोई उद्धारक नहीं और न हो शक्ति के अवतार
तुम हो बस धर्म-ग्रंथों के पात्र मात्र। 

- जेन्नी शबनम (7.9.2008)
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25. अधूरी कविता

अधूरी कविता

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तुम कहते -
सुनाओ कुछ अपनी कविता,
कैसे कहूँ
अब होती नहीं पूरी, मेरी कविता

अधूरी कविता अब बन गई ज़िन्दगी
जैसे अटक गए हों लफ़्ज़ ज़ुबाँ पे,
उलझी-उलझी बातें हैं
कुछ अनकहे अफ़साने हैं
दर्द के गीत और पथरीली राहें हैं

तुम क्या करोगे सुन मेरी कविता?
क्या जोड़ोगे कुछ अल्फ़ाज़ नए
ताकि कर सको पूरी, मेरी कविता

तुम वो दर्द कहाँ ढूँढ़ पाओगे?
तुम बे-इंतिहा प्रेम की प्यास कैसे जगाओगे?
अपनी आँखों से मेरी दुनिया कैसे देखोगे?
मेरी ज़िन्दगी का एहसास कहाँ कर पाओगे?

ज़िद करते हो
तो सुन लो, मेरी आधी कविता
ज़िद ना करो
पढ़ लो, आधी ही कविता

गर समझ सको ज़रा भी तुम
मेरी आधी-अधूरी कविता,
वाह-वाही के शब्द, न वारना मुझ पर
ज़ख़्मों को मेरे, यूँ न उभारना मुझ पर

पलभर को मेरी रूह में समा
पूर्ण कर दो मेरी कविता
तुम जानते तो हो
मेरी अधूरी ज़िन्दगी ही है
मेरी अधूरी कविता

- जेन्नी शबनम (4. 9. 2008)
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24. थक गई मैं

थक गई मैं

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वादा किया उसने 
उम्रभर साथ निभाने का 
लम्हों का सफ़र और रुसवा हो गया वो
जाने वादाखिलाफ़ी थी या अंत क़रीब मेरा
डर गया था वो

एक पाँव जीवन की दहलीज़ पर
दूसरा पाँव मौत की सरहद पर 
आज साथ सफ़र ख़त्म करती अपना

जीकर मौत का सफ़र देखा, शुक्रिया ख़ुदा!
अब तो जीने-मरने के खेल से उबार मुझे, ओ ख़ुदा!

ओ ख़ुदाया! तुम्हारे साथ सारे युग घुम आई
मैं तो थक गई, जाने तू क्यों न थका?

एक बार मेरी आत्मा में समा
और मेरी नज़र से देख
तू सहम न गया तो
ऐ ख़ुदा! तेरी क़सम
एक और जन्म क़ुबूल हमें !

- जेन्नी शबनम (3. 9. 2008)
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23. रात का नाता मुझसे

रात का नाता मुझसे

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मेरी कराह का नाता है
रातों से, जाने कितना गहरा
ख़ामोशी से सुनती और साथ मेरे जागती है

हौले से थाम मेरी बाहें
सुबह होने तक, साथ मेरे रोती है
आँसुओं से तर मेरी रूह को
रात अपने आगोश में पनाह देती है
कभी थपकी दे
ख़ुद जाग, हमें सुला देती है
मेरी दास्ताँ
रात अपने अँधियारे में छुपा लेती है

जाने ये कैसा नाता है?
क्यों वो इतने क़रीब है ?
रात की बाँहों में कहीं चाँदनी
कहीं लाखों सितारे
फिर क्यों, बिसरा कर ये रूहानी बातें
संग आ जाती मेरे मातम में, ये रातें

कुछ तो गहरा नाता है
मेरी तरह वो भी पनाह ढूँढ़ती शायद
मेरी तरह अकेली उदास शायद
इसी लिए एक दूसरे को ढाढ़स देने
रोज़ चुपके से आ जाती रातें
मिल बाँट दुःख-दर्द अपना
बसर होती संग रातें

रात का नाता मुझसे
सुबह की किरणों संग
हँसना है

- जेन्नी शबनम (2. 9. 2008)
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22. मुहब्बत! पहला लफ़्ज़

मुहब्बत! पहला लफ़्ज़

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मुहब्बत ही था पहला लफ़्ज़, जो कहा तुमने   
अजनबी थे, जब पहली ही बार हम मिले थे।   
कुछ भी साथ नहीं, क्षत-विक्षत मन था   
जाने कब-कब, कहाँ-कहाँ, किसने तोड़ा था।   
सारे टुकड़ों को, उस दिन से समेट रही   
आख़िर किस टुकड़े से कहा था तुमने, सोच रही।   
रावण के सिर-सा, मेरे मन का टुकड़ा   
बढ़ता जा रहा, फैलता जा रहा।   
अपने एक साबुत मन को, तलाशने में   
जिस्म और वक़्त थकता जा रहा।   
तुम्हीं ढूँढ़ दो न, मैं कैसे पहचानूँ?   
ख़ुद को भी भूल चुकी, अब मैं क्या करूँ?   
तुम्हें तो पहचान होगी न उसकी   
तुम्हीं ने तो देखा था उसे पहली बार।   
हज़ारों में से एक को पहचाना था तुमने   
तभी तो कहा था तुमने   
मुहब्बत का लफ़्ज़, पहली बार।

- जेन्नी शबनम (24. 2. 2009)
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मंगलवार, 24 फ़रवरी 2009

21. घर

घर

***

शून्य को ईंट-गारे से घेर, घर बनाना
एक भ्रम ही तो है
बेजान दीवारों से घर नहीं, महज़ आशियाना बनता है
घरों को मकान बनते अक्सर देखा है
मकान का घर बनना, ख़्वाबों-सा लगता है

न राम-सीता का घर बसा कभी
वरना ग़ैर के आरोप से घर न टूटता कभी
न कृष्ण का घर बसा कभी
वरना हज़ारों रानियों-पटरानियों से महल न सजता कभी
न राजमहलों को घर बनते सुना कभी
वरना रास-रंग न गूँजता कभी

देखा है कभी-कभी यों ही 
किसी फुटपाथ पर घर बसते हुए
फटे चिथड़ों और टूटी बरसाती से घर सजते हुए
रिश्तों की आँच और अपनेपन की छाँव से घर सँवरते हुए

ईंट की अँगीठी पर सूखी रोटी सेंकती, मुस्कुराती औरत
टूटी चारपाई पर अधनंगे बच्चे की किलकारी
थका-हारा-पस्त, पर ठहरा हुआ इन्सान 
उनका अटूट बन्धन, जो ओट देता हर थपेड़े से  
और बस जाता है एक घर

झोपड़ी-महल का फ़र्क़ नहीं, न ईंट-पत्थरों का है दोष
जज़्बात और यक़ीन की बुनियाद हो 
तो यों ही किसी वीराने में या आसमान तले 
बस जाता है घर

- जेन्नी शबनम (14.2.2009)
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20. अच्छा हुआ तुम न आए

अच्छा हुआ तुम न आए

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अच्छा हुआ जो तुम न आए
आदत थी तुम्हारी हमें
सदा पास रहने की
साथ जीने की

तुम्हारा न आना
अच्छा तो न लगा
पर अच्छा हुआ, जो तुम न आए
आदत थी तुम्हारी हमें

तुम्हें दूर जाना था, हमें जीना था
तुम बताओ, बिना दर्द कोई जीता है क्या?
अच्छा हुआ जो तुम न आए
आदत थी तुम्हारी हमें

कितने जन्मों का साथ है?
कब तक मेरे साथ होते तुम?
अच्छा हुआ जो तुम न आए
आदत थी तुम्हारी हमें

इस जीवन से मुक्ति पाना है
गर तुम आते, तो फिर एक बहाना जीने का
अच्छा हुआ जो तुम न आए
आदत थी तुम्हारी हमें

तुम वापस न आओ
जाओ कभी न आओ
जीने दो हमें अपने संग
बिना तुम्हारी आदत!

- जेन्नी शबनम (22. 2. 2009)
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19. अनुत्तरित प्रश्न है (क्षणिका)

अनुत्तरित प्रश्न है 

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अनुत्तरित प्रश्न है-
अहमियत क्या है मेरी?
कच्चा गोश्त हूँ, पिघलता जिस्म हूँ
बेजान बदन हूँ, भटकती रूह हूँ
या किसी के ख़्वाहिशों की बुत हूँ?
क्या कभी किसी के लिए इंसान हूँ?

- जेन्नी शबनम (21. 2. 2009)
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18. मेरी आज़माइश करते हो (अनुबन्ध/तुकान्त) (पुस्तक-नवधा)

मेरी आज़माइश करते हो

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ग़ैरों के सामने इश्क़ की नुमाइश करते हो
क्यों भला ज़िन्दगी की फ़रमाइश करते हो

इश्क़ करते नहीं ईमान से तुम कभी 
और ख़ुद ही उस ख़ुदा से नालिश करते हो

ग़ैरों की जमात के तुम मुसाफ़िर हो
अपनों में आशियाँ की गुंजाइश करते हो 

ज़ख़्म गहरा देते हो हर मुलाक़ात के बाद
और फिर भी मिलने की गुज़ारिश करते हो 

इक पहर का साथ तो मुमकिन नहीं
मुक़म्मल ज़िन्दगी की ख़्वाहिश करते हो 

तुम्हें तो आदत है बेवफ़ाई करने की
और 'शब' की वफ़ा की आज़माइश करते हो 

-जेन्नी शबनम (16. 2. 2009)
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17. मेरा अपना कुछ (क्षणिका)

मेरा अपना कुछ

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मेरा अपना एक टुकड़ा सूरज-चाँद है
एक कतरा धरती-आसमान है
कुछ छींटे सुर्ख़ उजाले, कुछ स्याह अँधियारे हैं
कुछ ख़ुशी के नग़्मे, कुछ दास्ताँ ग़मगीन हैं
थोड़े नासमझी के हश्र, थोड़े काबिलियत के फ़ख्र हैं
मुझे अपनी कहानी लिखनी है
इन 'कुछ' और 'थोड़े' जो मेरे पास हैं,
मुझे अपनी ज़िन्दगी जीनी है
ये 'अपने' जो मेरे साथ हैं

- जेन्नी शबनम (फ़रवरी 20, 2009)
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बुधवार, 18 फ़रवरी 2009

16. सुलगती ज़िन्दगी (क्षणिका)

सुलगती ज़िन्दगी

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मेरी नसों में लहू बनकर इक दर्द पिघलता है
मेरी साँसों में ख़ुमार बनकर इक ज़ख़्म उतरता है
इक ठंडी आग है समाती है सीने में मेरे, धीरे-धीरे
और उसकी लपटें जलाती है ज़िन्दगी मेरी, धीमे-धीमे
न राख है न चिंगारी पर ज़िन्दगी है कि सुलगती ही रहती है

- जेन्नी शबनम (फ़रवरी 17, 2009)
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बुधवार, 11 फ़रवरी 2009

15. ज़िन्दगी रेत का महल

ज़िन्दगी रेत का महल

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ज़िन्दगी रेत का महल है
हर लहर आकर बिखेर जाती है,
सपनों से रेत का महल हम फ़िर बनाते हैं
जानते हैं बिखर जाना है फ़िर भी 

हमारी मौजूदगी के निशान तो रेत पे न मिलेंगे कभी
किसी के दिल में चुपके से इक हूक-सी उठेगी कभी,
ज़ख्म तो पाया हर पग पर हमने
पर टीस उठेगी ज़रूर सीने में किसी के

रेत के महल-सा स्वप्न हमारा
क्या मुमकिन कि समंदर बख़्श दे कभी?
जीवन हो या रिश्ता, वक़्त की लहरों से बह तो जाना है ही
फिर भी सहेजते हैं रिश्ते, बनाते हैं रेत से महल

- जेन्नी शबनम (19. 9. 2008)
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14. तुमने सब दे दिया (अनुबन्ध/तुकान्त) (पुस्तक- नवधा))

तुमने सब दे दिया

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एक इम्तिहान-सा था, कल जो आकर गुज़र गया
वक़्त भी मुस्कुराया, जब तुमने मुझे जिता दिया 

एक वादा था तुम्हारा, कि सँभालोगे तुम मुझे 
लड़खड़ाए थे क़दम मेरे, तुमने निभा दिया 

रिश्ते ये कह गए, कि हम नहीं इस सदी के
इक ख़्वाब था जो साझा, वो मुझको दे दिया 

एक दिन होगा जब आएगी ज़रूर क़यामत 
उससे पहले तुमने हर क़यामत बरपा दिया। 

दहकता रहा मेरा जिस्म, पर तुम न जल सके
भरोसा तुमने 'शब' का, बस पुख़्ता कर दिया 

-जेन्नी शबनम (9. 2. 2009)
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13. ज़ब्त-ए-ग़म (तुकान्त)

ज़ब्त-ए-ग़म

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सुर्ख़ स्याही से सफ़ेद पन्नों पर
लिखी है किसी के ज़ब्त-ए-ग़म की तहरीर

शब्द के सीने में ज़ब्त है
किसी के जज़्बात की जागीर

दफ़न दर्द को कुरेदकर
गढ़ी गई है किताब रंगीन

बड़े जतन से सँभाल रखी है
किसी के अंतर्मन की तस्वीर

इजाज़त नहीं ज़माने को कि
बाँच सके किसी की तक़दीर

हश्र तो ख़ुदा जाने क्या हो
जब कोई तोड़ने को हो व्याकुल ज़ंजीर

नतीजा तो कुछ भी नहीं बस
संताप को मिल जाएगी इक ज़मीन

दर्द और ज़ख्म से जैसे
रच गई ज़ब्त-ए-ग़म की कहानी हसीन

गर रो सको तो पढ़ो कहानी
टूटी-बिखरी दफ़न है किसी की मुरादें प्राचीन

- जेन्नी शबनम (नवम्बर 9, 2008)
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12. संतान की आहुति

संतान की आहुति

(यह सिर्फ़ कविता नहीं, आप सभी के सोचने के लिए सवाल है। परिवार द्वारा अपनी संतान का क़त्ल कर देना क्योंकि उसने प्रेम करने का गुनाह किया। मनचाही ज़िन्दगी जीने की सज़ा क्या इतनी क्रूरता होती है? प्रेम पाप हो चुका शायद, तो कोई ईश्वर से भी प्रेम न करे!)

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प्रेम के नाम पे आहुति दी जाती 
प्रेम के लिए बलि चढ़ती,
कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि
वो वही संतान है, जो मुरादों से मिली
एक माँ के ख़ून से पनपी
प्रेम की एक दिव्य निशानी है

एक आँसू न आए हज़ार जतन किए जाते
हर ख़्वाहिश पे दम भर लुटाए जाते
दुनिया की ख़ुशी वारी जाती
एक हँसी पे सब क़ुर्बान होते

गर संतान अपनी मर्ज़ी से जीना चाहे
अपनी सोच से दुनिया देखे
अपनी पहचान की लगन लगे
अपने ख़्वाब पूरा करने को हो प्रतिबद्ध
फिर वही संतान बेमुराद हो जाती
जो दुआ थी कभी अब बददुआ पाती
घर का चिराग कलंक कहलाता
चाहे दुनिया वो रौशन करता

इंतिहा तो तब जब
मनचाहे साथी की ख़्वाहिश
पूरी करती संतान

समान जाति तो फिर भी क़ुबूल
संस्कारों से ढाँप, जगहँसाई से राहत देता परिवार
पर तमाम उम्र जिल्लत और नफ़रत पाती संतान

ग़ैर जाति में मिल जाए जो मन का मीत
घर से तिरस्कृत और बहिष्कृत कर देता परिवार
अपनों के प्यार से आजीवन महरूम हो जाती संतान

धर्म से बाहर जो मिल जाए किसी को अपना प्यार
मानवता की सारी हदों से गुज़र जाता परिवार

कथित आधुनिक परिवार हो अगर
इतना तो संतान पे होता उपकार
रिश्तों से बेदख़ल और जान बख़्श का मिलता वरदान

ख़ानदानी-धार्मिक का अभिमान, करे जो परिवार
इतना बड़ा अनर्थ... कैसे मिटे कलंक...
दे संतान की आहुति, बचा ली अपनी भक्ति

हर ख़ुशी पूरी करते, जीवन की ख़ुशी पे बलि चढ़ाते
इज़्ज़त की गुहार लगाते, संतान के ख़ून से अपनी इज़्ज़त बचाते,
प्रेम से है प्रतिष्ठा जाती, हत्यारा कहलाने से है प्रतिष्ठा बढ़ती
जाने कैसा संस्कारों का है खेल, प्रेम को मिटा गर्वान्वित हैं होते

- जेन्नी शबनम (8. 11. 2008) 
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11. मेरी बिटिया का जन्मदिन

मेरी बिटिया का जन्मदिन

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मेरी बिटिया का जन्मदिन आया, स्वर्णिम सुहाना नया सवेरा लाया
जन्मदिन मनाने सूरज आया, सर्दी और नर्म धूप साथ है लाया
मैंने ख़ूब बड़ा एक केक मँगाया, गुब्बारों से घर है सजाया
सगे-सम्बन्धी सब अपनों ने आशीष दिए, सबने मिलकर जश्न मनाया!

झूमती गाती 'ख़ुशी' मचलती, दोस्तों संग है धूम मचाती
हर दिन खूब है इठलाती सँवरती, 'तितली'-सी है आज उड़ती फिरती
नए कपड़े पहन फूलों-सी खिलती, बड़ी अदा से 'कुकू'-सी चहकती
ख़ूब सजी मासूम-सी इतराती, मेरी बिटिया प्यारी है दिखती!

ख़ुशियों से दामन सदा भरा रहे, युगों तक चमके तेरा नाम
जन्म-जन्मान्तर तक यूँ ही दमके, रौशन रहे सदा तेरा नाम
तू जीए यूँ ही वर्षों हज़ार, सुखों से भरा रहे तेरा भण्डार
तू मुस्कुराए यूँ ही उम्र तमाम, मैं ना रहूँ पर रहेगा सदा मेरा प्यार!

- जेन्नी शबनम (7. 1. 2009)
(मेरी बेटी परान्तिका के जन्मदिन पर)
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गुरुवार, 22 जनवरी 2009

10. यूँ ही चलने दो, यूँ ही जीने दो / Yun Hi Chalne Do, Yu Hin Jine Do

यूँ ही चलने दो, यूँ ही जीने दो

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ये क्या कह रहे हो?
सब जानते तो हो तुम
विध्वंस क्यों लाना चाहते हो?

मृग-मरीचिका-सा न भटको तुम
स्वर्ण-हिरण की चाह में न उलझाओ मुझको
एक ही महाभारत काफ़ी है, दूसरा न रचाओ तु

मेरे होंठों के कम्पन को आवाज़ देना चाहते हो
साँसों की थरथराहट को गति देना चाहते हो
मेरे सोये सपनों को आसमान देना चाहते हो

जानते हो न, मेरे तुम्हारे बीच सदियों का फ़ासला है
मीलों की नहीं जन्मों की खाई है
जन्म और मृत्यु का-सा पड़ाव है

तुम्हारे आवेश से ज़िन्दगी जल जाएगी
या जाने तुम्हारी ज्वाला तूफ़ान लाएगी
नई ज़िन्दगी शायद मिले, पर दुनिया मिट जाएगी

मेरी मूक चाहत को बेआवाज़ ज़ब्त कर लो तुम
मेरा अवलम्ब बन जाओ
मेरी ख़्वाहिशों को जी जाओ तुम

मेरी ज़मीन तुम्हारा आसमान
मेरे सपने तुम्हारी हक़ीकत
यूँ ही चलने दो, यूँ ही जीने दो

- जेन्नी शबनम (21. 1. 2009)
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Yun Hi Chalne Do, Yun Hi Jine Do

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ye kya kah rahe ho?
sab jaante to ho tum
vidhwans kyon laana chaahte ho?

mrig-marichika-sa na bhatko tum
swarn-hiran kee chaah mein na uljhaao mujhko
ek hi mahabhaarat kaafi hai, dusra na rachaao tum.

mere honthon ke kampan ko aawaz dena chaahte ho
saanson kee thartharaahat ko gati dena chahte ho
mere soye sapnon ko aasmaan dena chaahte ho.

jaante ho na, mere tumhaare beech sadiyon ka fasla hai
meelon ki nahin janmon ki khaai hai
janm aur mrityu ka-sa padaav hai.

tumhaare aavesh se zindgi jal jaayegi
ya jaane tumhaari jwaala toofaan laayegi
nayee zindgi shaayad mile, par duniya mit jaayegi.

meri mook chaahat ko beaawaaz zabt kar lo tum
mera awlamb ban jaao
meri khwaahishon ko ji jaao tum.

meri zameen tumhaara aasmaan
mere sapne tumhaaree haqikat
yun hi chalne do, yun hi jine do.

- Jenny Shabnam (21. 1. 2009)
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मंगलवार, 20 जनवरी 2009

9. बस सुनो! मेरी सुनो! सुनते जाओ! / Bus Suno! Meri Suno! Sunte Jaao!

बस सुनो! मेरी सुनो! सुनते जाओ!

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कोई सवाल अब तुम तो न पूछो
मेरा यकीन अब तुम तो न छीनो
सवाल-जवाब और हिसाब-किताब की
यूँ ही इंतिहा है मेरी ज़िन्दगी

सदियों से अब तक का मौन है
ख़्वाहिशों की बड़ी रुस्वाइयाँ हैं
जो हूँ, जैसे हूँ, वैसे ही रहने दो
बर्फ़-सा मुझे पिघल जाने दो

न रोको मुझे, न टोको मुझे
रफ़्ता-रफ़्ता सुनो, बस सुनते जाओ
न हँसो मुझपर, न भरो आह
बस सुनो, मेरी सुनो, सुनते जाओ

नहीं कहे, कभी किसी से अपने जज़्बात
डर है, बेबाक न हो जाए मेरे अल्फ़ाज़
तुमसे कुछ जो नाता है, तक़दीर का
उम्मीद नहीं कोई, बस वास्ता है, एक हमदर्द का

तुमसे जवाब नहीं माँगती, अपने वस्ल का
न हिसाब माँगती, अपने हिज्र का
करुँगी न शिकवा, तुम्हारे वादों का
न गिला, तुम्हारे दावों का

कोई सहूलियत नहीं चाहती, अपनी परवाज़ का
जब तक दम न टूटे मेरा, बस सुनते जाओ
न विचारो न धिक्कारो मुझे
बस सुनो! मेरी सुनो! सुनते जाओ!

- जेन्नी शबनम (12. 1. 2009)
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Bus Suno! Meri Suno! Sunte Jaao!

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Koi sawaal ab tum to na puchho
Mera yakeen ab tum to na chhino
Sawaal-jawaab aur hisaab-kitaab kee
Yun hi intihaa hai meri zindgi.

Sadiyon se abtak ka maun hai
Khwaahishon ki badi ruswaaiyan hain
Jo hoon, jaise hoon, waise hin rahne do
Barf-sa, mujhe pighal jane do.

Na roko mujhe, na toko mujhe
Rafta-rafta suno, bus sunte jaao
Na hanso mujhpar, na bharo aah
Bus suno, meri suno, sunte jaao.

Nahin kahe, kabhi kisi se apne jazbaat
Dar hai, bebaak na ho jaaye mere alfaaz
Tumse kuchh jo naata hai, taqdeer ka
Ummid nahi koi, bus wasta hai, ek humdard ka.

Tumse jawab nahi maangti, apne wasl ka
Na hisaab maangti, apne hizra ka
Karungi na shikwa, tumhaare waadon ka
Na gila, tumhaare daavon ka.

Koi sahuliyat nahin chaahti, apni parwaaz ka
Jab tak dum na toote mera, bus sunte jaao
Na vichaaro na dhikkaro mujhko
Bus suno! meri suno! sunte jaao!

- Jenny Shabnam (12. 1. 2009)
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8. ख़्वाहिश (क्षणिका) / Khwaahish (kshanika)

ख़्वाहिश

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एक कतरा सूरज की किरण, एक चुटकी चाँद की चाँदनी
एक अँजुरी जीने की ख़्वाहिश, एक मुट्ठी अरमानों की ज्वाला
बस इतनी ही चाह थी, जाने कैसी साध थी?
ये जो पाऊँ जन्नत पा लूँ, जाने कैसी उम्मीद थी?
अब जो जन्नत पायी, ख़्वाहिश हुई
ख़ुदा! तुझे पा लूँ!
अब जो ख़ुदा पाया, ख़्वाहिश भी बढ़ी
संग तेरे ख़ुदा, एक जन्म और पा लूँ!

- जेन्नी शबनम (3. 1. 2009)
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Khwaahish

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Ek katra suraj ki kiran, ek chutki chaand ki chaandni
ek anjuri jine ki khwaahish, ek mutthi armaanon ki jwaala
bus itni hi chaah thee, Jaane kaisi saadh thee?
Ye jo paaoon jannat paa loon, Jaane kaisi ummid thee?
Ab jo jannat payee, khwahish hui
Khuda! tujhe paa loon!
Ab jo khuda paya, khwahish bhi badhi
Sang tere Khuda, ek janm aur paa loon!

- Jenny Shabnam (3. 1. 2009)
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7. भीड़ / Bheed

भीड़

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मुझमे इतनी भीड़ इकट्ठी हो गई है  
कहाँ तलाशूँ ख़ुद को, कहाँ छुपाऊँ ख़ुद को?

हर वक़्त गूँजता भीड़ का कोलाहल है
कुछ सुन नहीं पाती, कुछ देख नहीं पाती

भीड़ का हुजूम जैसे बढ़ता जा रहा है
दिल, दिमाग़ और आत्मा जैसे सब फट जाने को है

सोते-जागते, उठते-बैठते हर जगह, हर वक़्त भीड़
क्या करूँ, कैसे रोकूँ?

मुझको मुझसे ही छीन, मुझमें ही क़ैद कर गया
ये अखण्डित भीड़

- जेन्नी शबनम (27.12.2008)
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Bheed

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Mujhme itni bheed ikatthi ho gai hai 
kahaan talaashoon khud ko, kahaan chhupaoon khud ko?

Her waqt goonjta bheed ka kolaahal hai
kuchh sun nahi paati, kuchh dekh nahi paati.

Bheed ka hujum jaise badhta ja raha hai
dil, dimag aur aatma jaise sab phat jane ko hai.

sote-jaagte, uthte-baithte her jagah, her waqt bheed.
Kya karoon, kaise rokoon?

Mujhko mujhse hi chheen, mujhme hi kaid kar gaya
ye akhandit Bheed.

- Jenny Shabnam (27.12.2008)
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6. एक जगह तलाश रही / Ek Jagah Talaash Rahi

एक जगह तलाश रही

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अपने लिए एक जगह तलाश रही
कभी किसी के घर में
कभी किसी के मन में,
युगों से बेआसरा हूँ
पनाह मिलती नहीं कहीं, बेवतन हूँ,
सिसकी पहुँचती नहीं उन तक
जो हमवतन हैं

कहाँ दफ़न करूँ ख़ुद को
अपने ही बदन में,
ध्वस्त मज़ार ख़ुद हूँ
दम्भ क्या करूँ जीवन का
जब बसर भर करनी हो ज़िन्दगी, 
फ़ख़्र क्या करूँ, जब यूँ बेमानी हो ज़िन्दगी,
जगह क्या तलाशूँ अब 
जब खो ही जाने को है ज़िन्दगी

- जेन्नी शबनम (फ़रवरी 1992)
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Ek Jagah Talaash Rahi

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Apne liye ek jagah talaash rahi
Kabhi kisi ke ghar mein
kabhi kisi ke mann mein,
Yugon se beaasra hun
Panaah miltee nahi kahi, Bewatan hun,
Siski pahunchti nahin untak
Jo humwatan hain.

Kahan dafan karun khud ko
Apne hi badan mein,
Dhwast mazaar khud hoon.
Dambh kya karoon jiwan ka
Jab basar bhar karni ho zindgi,
Fakra kya karoon, Jab Yun bemaanee ho zindgi,
jagah kya talaashoon ab
Jab kho hee jaane ko hai zindgi.

- Jenny Shabnam (Feburary 1992)
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5. हम तन्हा हैं (क्षणिका) / Hum Tanha Hain (kshanika)

हम तन्हा हैं 

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अपनी उदासियों का सबब
किससे कहें?
हम तन्हा हैं, न ख़ुदा है, न आप!

- जेन्नी शबनम (1. 1. 1990)
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Hum Tanha Hain 

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Apni udaasiyon ka sabab
kisase kahen ?
Hum tanha Hain, Na khuda hai, na aap!

- Jenny Shabnam (1. 1. 1990)
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4. आओ मेरे पास (क्षणिका) / Aao Mere Pass (kshanika)

आओ मेरे पास 

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आओ बैठो मेरे पास
जानूँ कि मैं तन्हा नहीं
आओ निहारो मेरा वजूद
जानूँ कि मैं अस्तित्वहीन नहीं
आओ प्यार से छुओ मुझे
जानूँ कि मुझमें सिर्फ़ काँटें नहीं
आओ आगोश में भर लो मुझे
जानूँ कि मेरा जीवित होना भ्रम नहीं

- जेन्नी शबनम (20. 12.  2008)
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Aao Mere Paas

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Aao baitho mere paas
jaanoon ki main tanha nahi
Aao nihaaro mera wajood
jaanoon ki main astitvaheen nahi
Aao pyar se chhuo mujhe
jaanoon ki mujhme sirf kaantein nahi
Aao aagosh me bhar lo mujhe
jaanoon ki mera jivit hona bhram nahi.

- Jenny Shabnam (20. 8. 2008)
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3. नया साल - 2009 / Naya Saal - 2009

नया साल - 2009

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भीग गई थीं पलकें, कल विदा हुआ पुराना साल
आई फिर नई उमंगें, लेकर उम्मीदें नया साल
नई तरंग, नई बहार, नई सुबह, नई रोशनी
ओस में गुँथी, नई भोर की पहली किरण सुनहरी

कल विदा हुई
हमारी कुछ अनकही कहानी 
ख़ुशनुमा यादें, कुछ लम्हें जज़्बाती
संजोग लें, जो रह गया अधूरा
आज मिला, ये नया सवेरा

पल-पल, पहर-पहर, साल-साल, युग-युग
अनवरत चलता समय का चक्र
कौन गुज़रा, कौन कुचला
कौन बसा, कौन बिखरा
अर्थहीन है, समय का विश्लेषण
असमर्थ है, प्रकृति भी
मत करो, समय का उल्लंघन
व्यर्थ है, समय के विपरीत जाने का चिन्तन

करें समर्पित, जो कुछ है अपना
भूल व्यथा, सजाएँ फिर नया सपना
कौन जाने, काल की भाषा
सब कुछ है अनजाना
कल क्या हो, कौन है जाना

मिली नई ज़िन्दगी, नई दुनिया
बढ़ लो, छू लो, थाम लो गगन
रहे न मन में, अतृप्त अभिलाषा
करो स्वागत, नए साल का
आज है, नए साल का नया सवेरा

- जेन्नी शबनम (1. 1. 2009)
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Naya Saal - 2009 

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Bhig gain theen palken, kal vida hua puraana saal
Aayee phir nayee umangein, lekar ummidein naya saal
Nayee tarang, nayee bahaar, nayee subah, nayee roshni
Oas me gunthi, nayee bhor ki pahli  kiran sunahri.

Kal vida hui, hamari kuchh ankahi kahaani
khushnuma yaaden, kuchh lamhen jazbaati
Sanjog lein, jo rah gaya adhura
Aaj mila, ye naya savera.

Pal-pal, pahar-pahar, saal-saal, yug-yug
Anwarat chalta samay ka chakra
Kaun guzra, kaun kuchla
Kaun basa, kaun bikhra
Arthheen hai, samay ka vishleshan
Asamarth hai, prakriti bhi
Mat karo, samay ka ullanghan
Vyarth hai, samay ke vipreet jaane ka chintan.

Karyen samarpit, jo kuchh hai apna
Bhool vyatha, sajaayen fir naya sapna
Kaun jaane, kaal ki bhasha
Sab kuchh hai anjana
Kal kya ho, kaun hai jana.

Mili nayee zindgi, nayee duniya
Badh lo, chhu lo, thaam lo gagan
Rahe na man mein, atript abhilasha
karo swaagat, naye saal ka
aaj hai, naye saal ka naya savera.

- Jenny Shabnam (1. 1. 2009)
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2. मेरे हिस्से का सब शेष हो गया / Mere Hisse Ka Sub Shesh Ho Gaya

मेरे हिस्से का सब शेष हो गया

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जाने कितनी भूख है
एक निवाले में ज़मीन-आसमान, चाँद-सितारे खा गई
जाने कितनी प्यास है
एक घूँट में नदी-सागर, झील-झरना पी गई
जाने कितनी ज्वाला है
एक क्षण में हवा, बादल और शीतलता सोख ली
जीने की जाने कितनी चाह है
युगों-कालों से जीती जा रही

अथाह वीराना, शून्यता, हाहाकार
साँसें भी कैसे लूँ?
अपने हिस्से का सब ख़त्म कर गई
अब किस आस में जीवित हूँ?

ग़ैरों के हिस्से को क्यों ताक रही?
ग़ैरों की साँसों से जीवित नहीं रहा जाता
अभी भी भूखी-प्यासी धधक रही हूँ
मेरे हिस्से का सब कुछ तो शेष हो गया!

- जेन्नी शबनम (18.12.2008)
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Mere Hisse Ka Sub Shesh Ho Gaya

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Jaane kitni bhookh hai
Ek niwaale mein
Zameen-aasmaan, chaand-sitaare kha gai,
Jane kitni pyaas hai
Ek ghoont mein
Nadi-sagar, jheel-jharna pee gai,
Jaane kitni jwaala hai
Saari hawaayen, baadal aur sheetalta sokh li,
Jine ki
Jaane kitni chaah hai
Yugon kaalon se jiti ja rahi.

Athaah viraana, shoonyta, haahaakaar.
Saansen bhi kaise loon?
Apne hisse ka sab khatm kar gai
Ab kis aas mein jivit hoon?
Gairon ke hisse ko kyon taak rahi?
Gairon kee saanso se
Jivit thode na raha jata!
Abhi bhi bhookhi-pyaasi dhdhak rahi hoon,
Mere hisse ka
sub kuchh to shesh ho gaya!

- Jenny Shabnam (18. 12. 2008)
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1. मुनासिब नहीं है मेरा होना / Munaasib Nahin Hai Mera Hona

मुनासिब नहीं है मेरा होना

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तुम (पुरूष) कहते -
मुनासिब नहीं है मेरा(स्त्री) होना,
सच ही कहते
हम हैं एक बेगाना सपना,
तुम कहते -
ज़रूरत नहीं है मेरा जीना,
सच ही कहते
हम हैं एक बेजान खिलौना

गर तुम्हारे काम न आ सकें
दीवारों पे न सज सकें,
सच है, कोई क्यों भरे
बेकारों से घर अपना
ईमान-धर्म की बात नही,
कोई क्यों सजाए, किसी का सपना

न एक सदी की बात है
न एक युग की है घटना,
गर विवशता है जीना तो
सीता की अग्नि-परीक्षा देनी होगी
सती के अग्नि-कुण्ड में होगा समाना

हो हौसला जीने का
हो प्रतिबद्ध अरमानों को पाने का,
बंद करो किसी के घर में सजना
ग़ैरों की ख़ातिर हँसकर जीना
न कोई होता है मसीहा
न कोई होता पालनहारा
न कोई चाहता, तुम्हारा आसमानों को छूना

कहती दुनिया, तुम्हें आबादी आधी,
फिर छीन लो तुम, दुनिया आधी
तुम कहते -
मुनासिब नहीं है मेरा होना,
हम कहते -
नामुमकिन है
बिना हमारे तुम्हारा होना

- जेन्नी शबनम (अक्टूबर, 2006)
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Munaasib Nahin Hai Mera Hona

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Tum(purush) kahte -
munasib nahin hai mera(stree) hona,
Sach hi kahte
hum hain ek begaana sapna.
Tum kahte -
zarurat nahin hai mera jina,
Sach hi kahte
hum hain ek bejaan khilona.

Gar tumhaare kaam na aa saken
deewaaron pe naa saj saken,
Sach hai, koi kyon bhare
bekaaron se ghar apna.
Imaan-dharam ki baat nahin,
Koi kyon sajaaye, kisi ka sapna.

Na ek sadee ki baat hai
na ek yug ki hai ghatna,
Gar vivashta hai jina to
Seeta ki agni-pariksha deni hogi
Sati ke agni-kund mein hoga samaana.

Ho haosla jine ka
ho pratibaddh armaanon ko paane ka,
Band karo kisi ke ghar mein sajna
gairon ki khaatir hans kar jina.
Na koi hota hai masiha
na koi hota palanhaara
Na koi chaahta, tumhaara aasmaanon ko chhuna.

Kahti duniya, tumhen aabaadi aadhi,
Phir chhin lo tum, duniya aadhi.
Tum kahte -
munasib nahin hai mera hona,
Hum kahte -
naamumkin hai
bina humaare tumhaara hona.

- Jenny Shabnam (October, 2006)
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