रविवार, 13 मार्च 2011

220. कब उजास होता है (तुकांत)

कब उजास होता है

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जाने कौन है जो आस पास होता है
दर्द यूँ ही तो नहीं ख़ास होता है

बहकते क़दमों को भला रोकें कैसे
हर तरफ़ उनका एहसास होता है

वो समझते नहीं है दिल की सदा
ज़ख़्म दिखाना भी परिहास होता है 

वक़्त की जादूगरी भी क्या खूब है
हँस-हँसकर जीवन उदास होता है 

ज़िन्दगी बसर कैसे हो भला उनकी
जिनके दिल में इश्क़ का वास होता है 

ग़ैरों के बदन को बेलिबास कर जाए
उनके मन पर कब लिबास होता है

'शब' सोचती है कल मिलेंगे उजाले से
तक़दीर में कब उसके उजास होता है 

- जेन्नी शबनम (11. 3. 2011)
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शुक्रवार, 11 मार्च 2011

219. चलते रहें हम

चलते रहें हम

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दूर आसमान के पार तक
या धरती के अंतिम छोर तक
हाथ थामे चलते रहें हम
आओ कोई गीत गाएँ 
प्रेम की बात करें
चलो यूँ ही चलते रहें हम
तुम्हारी बाहों का सहारा
आँखें मूँद खो जाएँ
साथ चले स्वप्न चलते रहें हम
'शब' तो जागती है रोज़
साथ जागो तुम भी कभी
और बस चलते रहें हम

- जेन्नी शबनम (10. 3. 2011)
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गुरुवार, 10 मार्च 2011

218. तुम शामिल हो (पुस्तक - 26)

तुम शामिल हो

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तुम शामिल हो
मेरी ज़िंदगी की 
कविता में...

कभी बयार बनकर
जो कल रात चुपके से घुस आई, झरोखे से
और मेरे बदन से लिपटी रही, शब भर

कभी ठंड की गुनगुनी धूप बनकर
जो मेरी देहरी पर, मेरी बतकही सुनते हुए
मेरे साथ बैठ जाती है अलसाई-सी, दिन भर

कभी फूलों की ख़ुशबू बनकर
जो उस रात, तुम्हारे आलिंगन से मुझमें समा गई
और रहेगी, उम्र भर

कभी जल बनकर
जो उस दिन, तुमसे विदा होने के बाद
मेरी आँखों से बहता रहा, आँसू बनकर

कभी अग्नि बनकर
जो उस रात दहक रही थी, और मैं पिघलकर
तुम्हारे साँचे में ढल रही थी
और तुम इन सबसे अनभिज्ञ, महज़ कर्त्तव्य निभा रहे थे

कभी साँस बनकर
जो मेरी हर थकान के बाद भी, मुझे जीवित रखती है
और मैं फिर से, उमंग से भर जाती हूँ

कभी आकाश बनकर
जहाँ तुम्हारी बाहें पकड़, मैं असीम में उड़ जाती हूँ
और आकाश की ऊँचाइयाँ, मुझमें उतर जाती हैं

कभी धरा बनकर
जिसकी गोद में, निर्भय सो जाती हूँ
इस कामना के साथ कि
अंतिम क्षणों तक, यूँ ही आँखें मूँदी रहूँ
तुम मेरे बालों को सहलाते रहो
और मैं सदा केलिए सो जाऊँ

कभी सपना बनकर
जो हर रात मैं देखती हूँ,
तुम हौले-से मेरी हथेली थाम, कहते हो -
''मुझे छोड़ तो न दोगी?''
और मैं चुपचाप, तुम्हारे सीने पे सिर रख देती हूँ

कभी भय बनकर
जो हमेशा मेरे मन में पलता है
और पूछती हूँ -
''मुझे छोड़ तो न दोगे?''
जानती हूँ तुम न छोड़ोगे
एक दिन मैं ही चली जाऊँगी
तुमसे बहुत दूर, जहाँ से वापस नहीं होता है कोई

तुम शामिल हो मेरे सफ़र के, हर लम्हों में
मेरे हमसफ़र बनकर
कभी मुझमें मैं बनकर
कभी मेरी कविता बनकर

- जेन्नी शबनम (5. 3. 2011)
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मंगलवार, 8 मार्च 2011

217. आज़ादी चाहती हूँ बदला नहीं

आज़ादी चाहती हूँ बदला नहीं

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तुम कहते हो-

‘’अपनी क़ैद से आज़ाद हो जाओ।’’

बँधे हाथ मेरे, सींखचे कैसे तोडूँ ?

जानती हूँ, उनके साथ मुझमें भी ज़ंग लग रहा है

अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद

एक हाथ भी आज़ाद नहीं करा पाती हूँ।


कहते ही रहते हो तुम

अपनी हाथों से काट क्यों नहीं देते मेरी जंज़ीर?

शायद डरते हो

बेड़ियों ने मेरे हाथ मज़बूत न कर दिए हों

या फिर कहीं तुम्हारी अधीनता अस्वीकार न कर दूँ

या कहीं ऐसा न हो

मैं बचाव में अपने हाथ तुम्हारे ख़िलाफ़ उठा लूँ।


मेरे साथी! डरो नहीं तुम

मैं महज़ आज़ादी चाहती हूँ बदला नहीं

किस-किस से लूँगी बदला

सभी तो मेरे ही अंश हैं

मेरे द्वारा सृजित मेरे अपने अंग हैं

तुम बस मेरा एक हाथ खोल दो

दूसरा मैं ख़ुद छुड़ा लूँगी

अपनी बेड़ियों का बदला नहीं चाहती

मैं भी तुम्हारी तरह आज़ाद जीना चाहती हूँ।


तुम मेरा एक हाथ भी छुड़ा नहीं सकते

तो फिर आज़ादी की बातें क्यों करते हो?

कोई आश्वासन न दो, न सहानुभूति दिखाओ

आज़ादी की बात दोहराकर

प्रगतिशील होने का ढोंग करते हो

अपनी खोखली बातों के साथ 

मुझसे सिर्फ़ छल करते हो

इस भ्रम में न रहो कि मैं तुम्हें नहीं जानती हूँ

तुम्हारा मुखौटा मैं भी पहचानती हूँ।


मैं इन्तिज़ार करूँगी उस हाथ का 

जो मेरा एक हाथ आज़ाद करा दे

इन्तिज़ार करूँगी उस मन का 

जो मुझे मेरी विवशता बताए बिना साथ चले

इन्तिज़ार करूँगी उस वक़्त का

जब जंज़ीर कमज़ोर पड़े और मैं अकेली उसे तोड़ दूँ।


जानती हूँ, कई युग और लगेंगे

थकी हूँ, पर हारी नहीं

तुम जैसों के आगे विनती करने से अच्छा है

मैं वक़्त या उस हाथ का इन्तिज़ार करूँ।


-जेन्नी शबनम  (8. 3. 2011)
(अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस पर)
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रविवार, 6 मार्च 2011

216. क्यों होती है आहत

क्यों होती है आहत

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लपलपाती ज़बाँ ने
जाने क्या कहा
थर्रा उठी वो बीच सड़क
गुज़र गए कई लोग
बगल से मुस्कुराकर
यूँ जैसे देख लिया हो
किसी नव यौवना का नंगा बदन
और फुरफुरी-सी
दौड़ गई हो बदन में

झुक गए सिर
ख़ामोशी से उसके
फिर आसमान में ताका उसने
सुना है कि वो आसमान में रहता है
क्यों नहीं दिखता उसे?
ऐसी रोज़ की शर्मिंदगी से
क्यों नहीं बचाता उसे?
करती तो है रोज़ सज्दा
क्यों नहीं सुनता उसे?

आँखों में पाशविकता
ज़बाँ में बेहयाई
क्या हैं वो सभी
चेतना मर चुकी है उनकी
सोचती है वो
क्यों होती है आहत
उनके कहे पर
जो महज़ लाश हैं

- जेन्नी शबनम (8. 3. 2007)
(अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर)
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शनिवार, 5 मार्च 2011

215. और कर ली पूरी मुराद

और कर ली पूरी मुराद

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वक़्त से माँग लायी
अपने लिए कुछ चोरी के लम्हात
मन किया जी लूँ ज़रा बेफ़िक्र
पा लूँ कुछ अनोखे एहसास

कम नहीं होता
किसी का साथ
प्यारी बातें
एक ख़ुशनुमा शाम
जो बन जाए तमाम उम्र केलिए
एक हसीन याद

हाथों में हाथ 
और तीन क़दमों में
नाप ली दुनिया हमने
और कर ली पूरी मुराद

जानती हूँ
यह कोई नयी बात नहीं
न होती है परखने की बात
पर पहली बार
दुनिया ने नहीं
मैंने परखा है दुनिया को

अपनी आँखों से देखती थी
पर आज देखी
किसी और की नज़रों से
अपनी ज़िन्दगी

पहले भी क्या ऐसी ही थी दुनिया?
पहले भी फूल तो खिले होते थे 
पर मुरझाए ही
मैं क्यों बटोरती थी?

क्या ये ग़ैर वाज़िब था?
कैसे मानूँ?
कहकर तो लाई थी वक़्त को
परवाह क्यों?
जब वक़्त को रंज नहीं!

- जेन्नी शबनम (27. 02. 2011)
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गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011

214. ज़ख़्मी पहर

ज़ख़्मी पहर

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वक़्त का एक ज़ख़्मी पहर
लहू संग ज़ेहन में समाकर
जकड़ लिया है मेरी सोच

कुछ बोलूँ
वो पहर अपने ज़ख़्म से
रंग देता है मेरे हर्फ़

चाहती हूँ
कभी किसी वक़्त कह पाऊँ
कुछ रूमानी
कुछ रूहानी-सी बात

पर नहीं
शायद कभी नहीं
ज़ख़्मी वक़्त से
मुक्ति नहीं

नहीं कह पाऊँगी
ऐसे अल्फ़ाज़
जो किसी को बना दे मेरा
और पा सकूँ
कोई सुखद एहसास!

- जेन्नी शबनम (31. 12. 2010)
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सोमवार, 14 फ़रवरी 2011

213. यह सब इत्तिफ़ाक़ नहीं

यह सब इत्तिफ़ाक़ नहीं

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कई लम्हे जो चुपके से
मेरे हवाले किये तुमने
और कुछ पल चुरा लिए
ज़माने से हमने
इतना जानती हूँ
यह सब इत्तिफ़ाक़ नहीं
तक़दीर का कोई रहस्य है
जो समझ से परे है
बेहतर भी है कि न जानूँ
जानना भी नहीं चाहती
क्यों हुआ यह इत्तिफ़ाक़?
क्या है रहस्य?
किसी आशंका से भयभीत हो
उन एहसासों को खोना नहीं चाहती
जो तुमसे पायी हूँ
जानती हूँ
कोई मंज़िल नहीं
न मिलनी है कभी मुझे
फिर भी हर बार
एक नयी ख़्वाहिश पाल लेती हूँ
और थोड़ा-थोड़ा जी लेती हूँ
जीवन के वो सभी पल
मुमकिन है
अब दोबारा न मिल पाए
फिर भी उम्मीद है
शायद
एक बार फिर...!
अब बस जीना चाहती हूँ
आँखें मूँद उन पलों के साथ
जिनमें
तुम्हें न देख रही थी
न सुन रही थी
सिर्फ़ तुम्हें जी रही थी

- जेन्नी शबनम (14 . 2 . 2011)
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रविवार, 13 फ़रवरी 2011

212. एक स्वप्न की तरह

एक स्वप्न की तरह

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बनते-बनते जाने कैसे
मैं कई सवाल बन गई हूँ   
जिनके जवाब
सिर्फ़ तुम्हारे पास हैं 
पर तुम बताओगे नहीं
मैं यह भी जानती हूँ,
शिकस्त खाना तुम्हारी आदत नहीं
और मात देना मेरी फ़ितरत नहीं,
फिर भी
जाने क्यों
तुम ख़ामोश होते हो
शायद ख़ुद को रोके रखते हो
कहीं मेरी आवारगी
मेरी यायावरी
तुम्हे डगमगा न दे
या फिर तुम्हारी दिशा बदल न दे,
मेरे हमदर्द!
फ़िक्र न करो
कुछ नहीं बदलेगा
जवाब तुमसे पुछूँगी नहीं
मैं यूँ ही सवाल बनकर
रह जाऊँगी
ख़ुद में गुम
तुमको यूँ ही दूर से देखते हुए
एक स्वप्न की तरह!

- जेन्नी शबनम (11. 2. 2011)
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सोमवार, 31 जनवरी 2011

211. तय था (पुस्तक- 28)

तय था

***

तय था
प्रेम का बिरवा लगाएँगे
फूल खिलेंगे और सुगंध से भर देंगे
एक दूजे का दामन हम

तय तो था
अंजुरी में भर, खुशिया लुटाएँगे
जब थककर
एक दूजे को समेटेंगे हम

तय यह भी था
मिट जाएँ बेरहम ज़माने के हाथों 
मगर दिल में लिखे नाम
मिटने न देंगे कभी हम

तय यह भी तो था
बिछड़ गये गर तो 
एक दूजे की यादों को सहेजकर
अर्घ्य देंगे हम

बस यह तय न कर पाए थे
कि तय किये 
सभी सपने बिखर जाएँ
फिर
क्या करेंगे हम?

-जेन्नी शबनम (30.1.2011)
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शनिवार, 29 जनवरी 2011

210. आधा-आधा (क्षणिका)

आधा-आधा

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तेरे पास वक़्त कम ज़िन्दगी बहुत
मेरे पास ज़िन्दगी कम वक़्त बहुत
आओ आधा-आधा बाँट लें, पूरा-पूरा जी लें

- जेन्नी शबनम (28. 1. 2011)
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शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

209. दस्तावेज़ (क्षणिका)

दस्तावेज़

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ज़िन्दगी एहसासों का दस्तावेज़ है
पल-पल हर्फ़ में पिरो दिया
शायद कभी कोई पढ़े मुझे भी 

- जेन्नी शबनम (26. 1. 2011)
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बुधवार, 26 जनवरी 2011

208. पिघलती शब

पिघलती शब

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उन कुछ पलों में जब अग्नि के साथ
मैं भी दहक रही थी
तुम कह बैठे -
क्यों उदास रहती हो?
मुझसे बाँट लिया करो न अपना अकेलापन
और यह भी कहा था तुमने -
एक कविता, मुझ पर भी लिखो न!

चाहकर भी तुम्हारी आँखों में देख न पायी थी
शायद ख़ुद से ही डर रही थी
कहीं ख़ुद को तुमसे बाँटने की चाह न पाल लूँ
या फिर तुम्हारे सामने कमज़ोर न पड़ जाऊँ 
कैसे बाँटू अपनी तन्हाई तुमसे
कहीं मेरी आरज़ू कोई तूफ़ान न ला दे
मैं कैसे लड़ पाऊँगी
तन्हा इन सब से!

उस अग्नि से पूछना 
जब मैं सुलग रही थी
वो तपिश अग्नि की नहीं थी
तुम थे जो धीरे-धीरे मुझे पिघला रहे थे
मैं चाहती थी उस वक़्त
तुम बादल बन जाओ
और मुझमें ठंडक भर दो
मैं नशे में नहीं थी
नशा तो नसों में पसरता है
मेरे ज़ेहन में तो सिर्फ़ तुम थे
उस वक़्त मैं पिघल रही थी
और तुम मुझे समेट रहे थे
शायद कर्तव्य मान
अपना पल मुझे दे रहे थे
या फिर मेरे झंझावत ने
तुम्हें रोक रखा था
कहीं मैं बहक न जाऊँ!

जानती हूँ वह सब भूल जाओगे तुम
याद रखना मुनासिब भी नहीं
पर मेरे हमदर्द!
यह भी जान लो
वह सभी पल मुझ पर क़र्ज़-से हैं
जिन्हें मैं उतारना नहीं चाहती
न कभी भूलना चाहती हूँ
जानती हूँ अब मुझमें
कुछ और ख़्वाहिशें जन्म लेंगी
लेकिन यह भी जानती हूँ
उन्हें मुझे ही मिटाना होगा!

मेरे उन कमज़ोर पलों को विस्मृत न कर देना
भले याद न करना कि कोई 'शब' जल रही थी
तुम्हारी तपिश से कुछ पिघल रहा था मुझमें
और तुम उसे समेटने का फ़र्ज़ निभा रहे थे
ओ मेरे हमदर्द!
तुम समझ रहे हो न मेरी पीड़ा
और जो कुछ मेरे मन में जन्म ले रहा है
जानती हूँ मैं नाकामयाब रही थी
ख़ुद को ज़ाहिर होने देने में
पर जाने क्यों अच्छा लगा कि
कुछ पल ही सही तुम मेरे साथ थे
जो महज़ फ़र्ज़ से बँधा
मुझे समझ रहा था!

- जेन्नी शबनम (25. 1. 2011)
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रविवार, 23 जनवरी 2011

207. पाप तो नहीं

पाप तो नहीं

***

जीवन के मायने हैं 
जीवित होना या जीवित रहना 
क्या सिर्फ़ साँसें ही तक़ाज़ा हैं?
 
फिर क्यों दर्द से व्याकुल होता है मन
क्यों कराह उठती है आत्मा
पूर्णता के बाद भी
क्यों अधूरा-सा रहता है मन?
 
इच्छाएँ कभी मरती नहीं
भले कम पड़ जाए ज़िन्दगी
पल-पल ख़्वाहिशें बढ़ती हैं 
तय है कि सब नष्ट होना है
या फिर छिन जाना है
 
सुकून के कुछ पल
क्यों कभी-कभी पूरी ज़िन्दगी से लगते हैं?
यथार्थ से परे न सोचना है, न रुकना है
ज़िन्दगी जीना या चाहना
पाप तो नहीं?

- जेन्नी शबनम (23.1.2011)
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206. मर्द ने कहा (पुस्तक पेज - 68)

मर्द ने कहा

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मर्द ने कहा -
ऐ औरत!
ख़ामोश होकर मेरी बात सुन
जो कहता हूँ वही कर
मेरे घर में रहना है, तो अपनी औक़ात में रह
मेरे हिसाब से चल, वरना...!

वर्षों से बिखरती रही, औरत हर कोने में
उसके निशाँ पसरे थे, हर कोने में
हर रोज़ पोछती रही, अपनी निशानी
जब से वह, मर्द के घर में थी आई
नहीं चाहती कि कहीं कुछ भी, रह जाए उसका वहाँ
हर जगह उसके निशाँ, पर वो थी ही कहाँ?

वर्षों बीत जाने पर भी
मर्द बार-बार औरत को
उसकी औक़ात बताता है
कहाँ जाए वो?
घर भी अजनबी और वो मर्द भी
नहीं है औरत के लिए, कोई कोना
जहाँ सुकून से, रो भी सके!

- जेन्नी शबनम (22. 1. 2011)
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गुरुवार, 20 जनवरी 2011

205. तुम्हारा कंधा

तुम्हारा कंधा

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अपना कंधा
एक दिन उधार दे देना मुझे
उस दिन अपना वक़्त जैसे दिया था तुमने
तमाम सपनों की टूटन का दर्द
जो पिघलता है मुझमें
और मेरी हँसी बन बिखरता है फ़िज़ाओं में
बह जाने देना
शायद इसके बाद
खो दूँ तुम्हें  

उस वक़्त का वास्ता
जब आँखों से ज़िन्दगी जी रही थी मैं
और तुम अपनी आँखों से
ज़िन्दगी दिखा रहे थे मुझे
नहीं रुकना तुम
चले जाना बिना सच कहे मुझसे
कुछ भी अपने लिए नहीं माँगूगी मैं
वादा है तुमसे 

यक़ीनन झूठ को ज़मीन नहीं मिलती
पर एक पाप तुम्हारा
मेरे हर जन्म पर एहसान होगा
और मुमकिन है वो एक क़र्ज़
अगले जन्म में
मिलने की वज़ह बने  

तुम्हारी आँखों से नहीं
अपनी आँखों से
ज़िन्दगी देखने का मन है
भ्रम में जीने देना
मुझे बह जाने देना
अपना कंधा
एक दिन उधार दे देना  

- जेन्नी शबनम (20. 1. 2011)
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मंगलवार, 18 जनवरी 2011

204. अब मान ही लेना है

अब मान ही लेना है 

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तुम बहुत आगे निकल गए   
मैं बहुत पीछे छूट गई   
कैसे दिखाऊँ तुम्हें   
मेरे पाँव के छाले,   
तुम्हारे पीछे भागते-भागते   
काँटे चुभते रहे   
फिर भी दौड़ती रही   
शायद पहुँच जाऊँ तुम तक,   
पर अब लगता है   
ये सफ़र का फ़ासला नहीं   
जो तुम कभी थम जाओ   
और मैं भागती हुई   
पहुँच जाऊँ तुम तक,   
शायद ये वक़्त का फ़ासला है   
या तक़दीर का फ़ैसला   
हौसला कम तो न था   
पर अब मान ही लेना है!

- जेन्नी शबनम (14. 1. 2011)
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बुधवार, 12 जनवरी 2011

203. संकल्प

संकल्प

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चलते-चलते
उस पुलिया पर चली गई
जहाँ से कई बार गुज़र चुकी हूँ
और अभी-अभी पटरी पर से
एक रेलगाड़ी गुज़री है 

ठण्ड की ठिठुरती दोपहरी
कँपकँपी इतनी कि जिस्म ही नहीं
मन भी अलसाया-सा है
तुम्हारा हाथ अपने हाथ में लिए
मूँदी आँखों से मैं तुम्हें देख रही हूँ 

तुमसे कहती हूँ -
मीत!
साथ-साथ चलोगे न
हर झंझावत में पास रहोगे न
जब भी थक जाऊँ, मुझे थाम लोगे न
एक संकल्प तुम भी लो आज, मैं भी लेती हूँ
कोई सवाल न तुम करना
कोई ज़िद मैं भी न करुँगी
तमाम उम्र यूँ ही 
साथ-साथ चलेंगे, साथ-साथ जीएँगे 

तुम्हारी हथेली पर अपनी हथेली रख
करती रही मैं, तुम्हारे संकल्प-शब्द का इंतज़ार
अचानक एक रेलगाड़ी धड़धड़ाती हुई गुज़र गई
मैं तुम्हारी हथेली ज़ोर से पकड़ ली
तुम्हारे शब्द विलीन हो गए
मैं सुन न पायी या तुमने ही कोई संकल्प न लिया 

अचानक तुमने झिंझोड़ा मुझे
क्या कर रही हो?
यूँ रेल की पटरी के पास
कुछ हो जाता तो?

मैं हतप्रभ!
चारो तरफ़ सन्नाटा
सोचने लगी, किसे थामे थी
किससे संकल्प ले रही थी?

रेलगाड़ी की आवाज़ अब दूर जा चुकी है
मैं अकेली पुलिया की रेलिंग थामे
पता नहीं ज़िन्दगी जीने या खोने
जाने किस संकल्प की आस
कोई नहीं आस पास
न तुम, न मैं!

- जेन्नी शबनम (11. 1. 2011)
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सोमवार, 10 जनवरी 2011

202. तुममें अपनी ज़िन्दगी

तुममें अपनी ज़िन्दगी

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सोचती हूँ
कैसे तय किया होगा तुमने
ज़िन्दगी का वो सफ़र
जब तन्हा ख़ुद में जी रहे थे 
और ख़ुद से ही एक लड़ाई लड़ रहे थे  

जानती हूँ 
उस सफ़र की पीड़ा
वाक़िफ़ भी हूँ उस दर्द से
जब भीड़ में कोई तन्हा रह जाता है
नहीं होता कोई अपना
जिससे बाँट सके ख़ुद को 

तुम्हारी हार
मैं नहीं सह सकती
और तुम
मेरी आँखों में आँसू
चलो कोई नयी राह तलाशते हैं
साथ न सही दूर-दूर ही चलते हैं 
बीती बातें, मैं भी छोड़ देती हूँ
और तुम भी ख़ुद से
अलग कर दो अपना अतीत
तुम मेरी आँखों में हँसी भरना
और मैं तुममें अपनी ज़िन्दगी 

- जेन्नी शबनम (8. 1. 2011)
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गुरुवार, 6 जनवरी 2011

201. नए साल में मेरा चाँद (क्षणिका)

नए साल में मेरा चाँद

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चाँद के दीदार को हम तरस गए
अल्लाह! अमावास का अंत क्यों नहीं होता?
मुमकिन है नया साल
चाँद से रूबरू करा जाए 

- जेन्नी शबनम (6. 1. 2011)
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मंगलवार, 4 जनवरी 2011

200. हर लम्हा सबने उसे (तुकांत)

हर लम्हा सबने उसे

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मुद्दतों की तमन्नाओं को, मरते देखा
मानों आसमाँ से तारा कोई, गिरते देखा 

मिलती नहीं राह मुकम्मल, जिधर जाएँ
बेअदबी का इल्ज़ाम, ख़ुद को लुटते देखा  

हर इम्तहान से गुज़र गए, तो क्या हुआ
इबादत में झुका सिर, उसे भी कटते देखा  

इश्क़ की बाबत कहा, हर ख़ुदा के बन्दे ने
फिर क्यों हुए रुसवा, इश्क़ को मिटते देखा  

अपनों के खोने का दर्द, तन्हा दिल ही जाने है
रुख़सत हो गए जो, अक्सर याद में रोते देखा  

मान लिया सबने, वो नामुराद ही है फिर भी
रूह सँभाले, उसे मर-मर कर बस जीते देखा 

'शब' की दर्द-ए-दास्तान, न पूछो मेरे मीत
हर लम्हा सबने उसे, बस यूँ ही हँसते देखा 

- जेन्नी शबनम (4. 1. 2011)
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सोमवार, 3 जनवरी 2011

199. अनाम भले हो

अनाम भले हो

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तुम्हारी बाहें थाम 
पार कर ली रास्ता
तनिक तो संकोच होगा 
भरोसा भले हो 

नहीं होता आसान 
आँखें मूँद चलना
कुछ तो संशय होगा 
साहस भले हो 

दायरे से निकलना 
मनचाहा करना
कुछ तो नसीब होगा 
कम भले हो 

साथ जीने की लालसा 
आतुरता भी बहुत
शायद यह प्रेम होगा 
अनाम भले हो 

- जेन्नी शबनम (3. 1. 2011)
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बुधवार, 29 दिसंबर 2010

198. एक टुकड़ा पल

एक टुकड़ा पल

*******

उस मुलाक़ात में
तुम दे गए, अपने वक़्त का एक टुकड़ा
और ले गए, मेरे वक़्त का एक टुकड़ा 

तुम्हारा वो टुकड़ा
मुझमें 'मैं' बनकर, समाहित हो गया
जो हर पहर मुझे
छुपाए रखता है, अपने सीने में  

ज़रा देर को भी वो
मुझसे अलग हो तो, मैं रो देती हूँ
एक वही है जो, जीना सिखाता है
तुम तो जानते हो न यह
और वह सब भी
जो मैं अपने साथ करती हूँ
या जो मेरे साथ होता है 

पर तुम वो मेरा टुकड़ा
कहाँ छोड़ आए हो?
जानती हूँ वो मूल्यवान नहीं
न ही तुमको इसकी ज़रूरत होगी
पर मेरे जीवन का सबसे अनमोल है
मेरे वक़्त का वो टुकड़ा 

याद है तुमको
वह वक़्त जो हमने जिया
अंतिम निवाला जो तुमने, अपने हाथों से खिलाया
और उस ऊँचे टीले से उतरने में
मैं बेख़ौफ़ तुम्हारा हाथ थाम कूद गई थी 

आलिंगन की इजाज़त
न मैंने माँगी, न तुमने चाही
हमारी साँसें और वक़्त
दोनो ही तेज़ी से दौड़ गए
और हम देखते रहे,
वो तुम्हारी गाड़ी की सीट पर
आलिंगनबद्ध मुस्कुरा रहे थे 

जानती हूँ
वह सब बन गया है तुम्हारा अतीत
पर इसे विस्मृत न करना मीत
मेरे वक़्त को साथ न रखो
पर दूर न करना ख़ुद से कभी
जब मिलो किसी महफ़िल में
तब साथ उसे भी ले आना
वहीं होगा तुम्हारा वक़्त मेरे साथ 

हमारे वक़्त के टुकड़े
गलबहियाँ किए वहीं होंगे
मैं सिफ टुकुर-टुकुर देखूँगी
तुम भले न देखना
पर वापसी में मेरे वक़्त को
ले जाना अपने साथ
अगली मुलाक़ात के इंतज़ार में
मैं रहूँगी
तुम्हारे उसी, वक़्त के टुकड़े के साथ 

- जेन्नी शबनम (29. 12. 2010)
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सोमवार, 27 दिसंबर 2010

197. तुम्हारी आँखों से देखूँ दुनिया

तुम्हारी आँखों से देखूँ दुनिया

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चाह थी मेरी
तीन पल में सिमट जाए दूरियाँ
हसरत थी
तुम्हारी आँखों से देखूँ दुनिया 

बाहें थाम, चल पड़ी साथ
जीने को खुशियाँ
बंद सपने मचलने लगे
मानो खिल गई, सपनों की बगिया 

शिलाओं के झुरमुट में
अवशेषों की गवाही
और थाम ली तुमने बहियाँ
जी उठी मैं फिर से सनम
जैसे तुम्हारी साँसों से
जीती हों वादियाँ 

उन अवशेषों में छोड़ आए हम
अपनी भी कुछ निशानियाँ
जहाँ लिखी थी इश्क़ की इबारत
वहाँ हमने भी रची कहानियाँ 

मिलेंगे फिर कभी
ग़र ख़्वाब तुम सजाओ
रहेंगी न फिर मेरी वीरानियाँ
बिन कहे ही तय हुआ
साथ चलेंगे हम
यूँ ही जीएँगे सदियाँ 

- जेन्नी शबनम (18. 12. 2010)
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शनिवार, 18 दिसंबर 2010

196. जादू की एक अदृश्य छड़ी

जादू की एक अदृश्य छड़ी

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तुम्हारे हाथ में रहती है
जादू की एक अदृश्य छड़ी
जिसे घुमाकर करते हो
अपनी मनचाही हर कामना पूरी
और रचते हो अपने लिए स्वप्निल संसार 

उसी छड़ी से छूकर
बना दो मुझे वह पवित्र परी
जिसे तुम अपनी कल्पनाओं में देखते हो
और अपने स्पर्श से प्राण फूँकते हो 

फिर मैं भी हिस्सा बन जाऊँगी
तुम्हारे संसार का
और जाना न होगा मुझे, उस मृत वन में
जहाँ हर पहर ढूँढती हूँ मैं, अपने प्राण 

- जेन्नी शबनम (13.12.2010)
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रविवार, 12 दिसंबर 2010

195. मेरे साथ-साथ चलो

मेरे साथ-साथ चलो

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तुम कहते हो तो चलो
पर एक क़दम फ़ासले पर नहीं
मेरे साथ-साथ चलो,
मुझे भी देखनी है वो दुनिया
जहाँ तुम पूर्णता से रहते हो 


तुमने तो महसूस किया है
जलते सूरज की नर्म किरणें
तपते चाँद की शीतल चाँदनी
तुमने तो सुना है
हवाओं का प्रेम गीत 
नदियों का कलरव
तुमने तो देखा है
फूलों की मादक मुस्कान 
जीवन का इन्द्रधनुष 

तुम तो जानते हो
शब्दों को कैसे जगाते हैं और
मनभावन कविता कैसे रचते हैं,
यह भी जान लो मेरे मीत
जो बातें अनकहे मैं तुमसे कहती हूँ
और जिन सपनों की मैं ख़्वाहिशमंद हूँ 

मैं भी जीना चाहती हूँ, उन सभी एहसासों को
जिन्हें तुम जीते हो और मेरे लिए चाहते हो
पर एक क़दम फ़ासले पर नहीं
मेरे साथ-साथ चलो 

- जेन्नी शबनम (12. 12. 2010)
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194. हार (क्षणिका)

हर हार मुझे और हराती है

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आज मैं ख़ाली-ख़ाली-सी हूँ, अपने अतीत को टटोल रही
तमाम चेष्टा के बाद भी बिखरने से रोक न पायी
नहीं मालूम जीने का हुनर क्यों न आया?
अपने सपनों को पालना क्यों न आया?
जानती हूँ मेरी विफलताओं का आरोप मुझ पर ही है
मेरी हार का दंश मुझे ही झेलना है
पर मेरे सपनों की परिणति, पीड़ा तो देती है न!
हर हार, मुझे और हराती है

- जेन्नी शबनम (9. 12. 2010)
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गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

193. तुम्हारा कहा क्या टाला मैंने

तुम्हारा कहा क्या टाला मैंने

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तुम कहते हो हँसती रहा करो
दुनिया ख़ूबसूरत है जिया करो
कभी आकर देख भी जाओ
तुम्हारा कहा क्या टाला मैंने?

हँसती ही रहती हूँ हर मुनासिब वक़्त
सभी पूछते हैं मैं क्यों इतना हँसती हूँ
नहीं देखा किसी ने मुझे मुर्झाए हुए
अपने किसी भी दर्द पर रोते हुए

पर अब थक गई हूँ
अक्सर आँखें नम हो जाती हैं
शायद हँसी की सीमा ख़त्म हो रही या
ख़ुद को भ्रमित करने का साहस नहीं रहा

पर तुम्हारा कहा अब तक जिया मैंने
हर वादा अब तक निभाया मैंने
एक बार आकर देख जाओ
तुम्हारा कहा क्या टाला मैंने

- जेन्नी शबनम (8. 12. 2010)
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मंगलवार, 7 दिसंबर 2010

192. चहारदीवारी का चोर दरवाज़ा

चहारदीवारी का चोर दरवाज़ा 

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ज़िन्दगी और सपनों के चारों तरफ़ 

ऊँची चहारदीवारी 

जन्म लेते ही तोहफ़े में मिलती है

तमाम उम्र उसी में क़ैद रहना

शायद मुनासिब है और ज़रूरत भी

पिता-भाई और पति-पुत्र का कड़ा पहरा

फिर भी असुरक्षित, अपने ही क़िले में।


चहारदीवारी में एक मज़बूत दरवाज़ा होता है

जिससे सभी अपने एवं रिश्ते 

ससम्मान और साधिकार प्रवेश पाते हैं

लेकिन उनमें कइयों की आँखें 

सबके सामने निर्वस्त्र कर जाती हैं

कुछ को मौक़ा मिला और ज़रा-सा छूकर तृप्त

कइयों की आँखें लपलपातीं हैं

और भेड़िए-से टूट पड़ते हैं

ख़ुद को शर्मसार होने का भय

फिर स्वतः क़ैद हो जाती है ज़िन्दगी।


चहारदीवारी में एक चोर दरवाज़ा भी होता है

जहाँ से मन का राही प्रवेश पाता है

कई बार वही पहला साथी 

सबसे बड़ा शिकारी निकलता है

प्रेम की आड़ में भूख मिटा, भाग खड़ा होता है

ठगे जाने का दर्द छुपाए, कब तक तनहा जिए

वक़्त का मरहम, दर्द को ज़रा-सा कम करता है

फिर कोई राही प्रवेश करता है

क़दम-क़दम फूँककर चलना सीख जाने पर भी

नया आया हमदर्द

बासी गोश्त कह, छोड़कर चला जाता है।


यक़ीन टूटता है, सपने फिर सँवरने लगते हैं

चोर दरवाज़े पर उम्मीद भरी नज़र टिकी होती है

फिर कोई आता है और रिश्तों में बाँध

तमाम उम्र को साथ ले जाता है

नहीं मालूम क्या बनेगी

महज़ एक साधन 

जो जिस्म, रिश्ता और रिवाज का फ़र्ज़ निभाएगी

या चोर दरवाज़े पर टकटकी लगाए

अपने सपनों को उसी राह वापस करती रहेगी

या कभी कोई और प्रवेश कर जाए

तो उम्मीद से ताकती

नहीं मालूम, वह गोश्त रह जाएगी या जिस्म

फिर एक और दर्द

चोर दरवाज़ा ज़ोर से सदा के लिए बन्द।


चहारदीवारी के भीतर

जिस्म से ज़्यादा और कुछ नहीं

चोर दरवाज़े से भी कोई रूह तक नहीं पहुँचता है

आख़िर क्यों?


-जेन्नी शबनम (नवम्बर 1990)
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शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

191. न आओ तुम सपनों में

न आओ तुम सपनों में

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क्यों आते हो सपनों में बार-बार
जानते हो न मेरी नियति
क्यों बढ़ाते हो मेरी मुश्किलें
जानते हो न मेरी स्थिति

विषमताएँ मैंने ख़ुद नहीं ओढ़ी जानेमन
न कभी चाहा कि ऐसा जीवन पाऊँ
मैंने तो अपनी परछाई से भी नाता तोड़ लिया
जीवन के हर रंग से मुँह मोड़ लिया

कुछ सवाल होते हैं
पर अनपूछे
जवाब भी होते हैं
पर अनकहे
समझ जाओ न मेरी बात
बिन कहे मेरी हर बात

न दिखाओ दुनिया की रंगीनी
रहने दो मुझे मेरे जागते जीवन में
मुमकिन नहीं कि तुम्हें सपने में देखूँ
न आया करो मेरे हमदम मेरे सपनों में

- जेन्नी शबनम (3. 12. 2010)
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बुधवार, 1 दिसंबर 2010

190. अपनों का अजनबी बनना

अपनों का अजनबी बनना

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समीप की दो समानान्तर राहें
कहीं-न-कहीं किसी मोड़ पर मिल जाती हैं
दो अजनबी साथ हों 
तो कभी-न-कभी अपने बन जाते हैं 

जब दो राह 
दो अलग-अलग दिशाओं में चल पड़े फिर?
दो अपने साथ रहकर अजनबी बन जाएँ फिर?

सम्भावनाओं को नष्टकर नहीं मिलती कोई राह
कठिन नहीं होता, अजनबी का अपना बनना
कठिन होता है, अपनों का अजनबी बनना

एक घर में दो अजनबी
नहीं होती महज़ एक पल की घटना
पलभर में अजनबी अपना बन जाता है
लेकिन अपनों का अजनबी बनना, धीमे-धीमे होता है

व्यथा की छोटी-छोटी कहानी होती है
पल-पल में दूरी बढ़ती है
बेगानापन पनपता है 
फ़िक्र मिट जाती है
कोई चाहत नहीं ठहरती है

असम्भव हो जाता है
ऐसे अजनबी को अपना मानना

-जेन्नी शबनम (1.12.2010)
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रविवार, 14 नवंबर 2010

189. कैसा लगता होगा

कैसा लगता होगा

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कैसा लगता होगा
जब किसी घर में
अम्मा-बाबा संग 
बिटिया रहती है
कैसा लगता होगा
जब अम्मा कौर-कौर 
बिटिया को खिलाती है
कैसा लगता होगा
जब बाबा की गोद में 
बिटिया इतराती है

क्या जानूँ वो एहसास
जाने कैसा लगता होगा
पर सोचती हूँ हमेशा
बड़ा प्यारा लगता होगा
अम्मा-बाबा की बिटिया का
सब कुछ वहाँ कितना
अपना-अपना-सा होता होगा

बहुत मन करता है
एक छोटी बच्ची बन जाऊँ
ख़ूब दौडूँ-उछलूँ-नाचूँ   
बेफ़िक्र हो शरारत करूँ
ज़रा-सी चोट पर
अम्मा-बाबा की गोद में
जा चिपक उनको चिढ़ाऊँ

सोचती हूँ
अगर ये चमत्कार हुआ तो
बन भी जाऊँ बच्ची तो
अम्मा-बाबा कहाँ से लाऊँ?
जाने कैसे थे, कहाँ गए वो?
कोई नहीं बताता, क्यों छोड़ गए वो?

यहाँ सब यतीम
कौन किसको समझाए
आज तो बहुत मिला प्यार सबका
रोज़-रोज़ कौन जतलाए
यही है जीवन 
समझ में अब आ ही जाए

न मैं बच्ची बनी
न बनूँगी किसी की अपनी
हर शब यूँ ही तन्हा
इसी दर पर गुज़र जाएगी
रहम से देखती आँखें सबकी
मेरी ख़ाली हथेली की दुआ ले जाएगी

- जेन्नी शबनम (14. 11. 2010)
(बाल दिवस पर एक यतीम बालिका की मनोदशा)
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शनिवार, 13 नवंबर 2010

188. रचती हूँ अपनी कविता (क्षणिका)

रचती हूँ अपनी कविता

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दर्द का आलम यूँ ही नहीं होता लिखना
ज़ख़्म को नासूर बना होता है दर्द जीना
कैसे कहूँ, कब किसके दर्द को जिया
या अपने ही ज़ख़्म को छील, नासूर बनाया
ज़िन्दगी हो या कि मन की परम अवस्था
स्वयं में पूर्ण समा, फिर रचती हूँ अपनी कविता 

- जेन्नी शबनम - (12. 11. 2010)
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बुधवार, 10 नवंबर 2010

187. आदमी और जानवर की बात

आदमी और जानवर की बात

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रौशन शहर, चहकते लोग
आदमी की भीड़, अपार शोर
शुभ आगमन की तैयारी पूरी
रात्रि पहर घर आएगी समृद्धि 

पर जाने क्या हुआ कल रात
वे रोते-भौंकते रहे, सारी रात
बेदम होते रहे, कौन समझे उनकी बात
आदमी तो नहीं, जो कह सकें अपनी बात 

कल के दिन न मिले, कोई अशुभ सन्देश
शुभ दिन में श्वान का रोना, है अशुभ संकेत
पास की कोठी का मालिक झल्लाता रहा पूरी रात
जाने कैसी विपत्ति आए, हे प्रभु! करना तुम निदान 

पेट के लिए हो जाए, आज का कुछ तो जुगाड़
सुबह से सब शांत, वे निकल पड़े लिए आस
कोठी का मालिक अब जाकर हुआ संतुष्ट
शायद आपदा किसी और के लिए, है बड़ा ख़ुश 

अमावास की रात, सजी दीपों की क़तार
हर तरफ़ पटाखों की गूँजती आवाज़
भय से आक्रान्त, वे लगे चीखने-भौंकने
नहीं समझ, वे किससे अपना डर कहें 

जा दुबके, उसी बुढ़िया के बिस्तर में
जहाँ वे मिल-बाँट खाते-सोते वर्षों से
दुलार से रोज़ उनको सहलाती थी बुढ़िया
सुन पटाखे की तेज गूँज, कल ही मर गई थी बुढ़िया 

कौन आज उनको चुप कराए
कौन आज कुछ भी खाने को दे
आज कचरा भी तो नहीं कहीं
ख़ाली पेट, चलो आज यूँ ही सही 

ममतामयी हाथ कल से निढाल पसरा
ख़ौफ़ है और उस खोह में मातम पसरा
आदमी नहीं, वह थी उनकी-सी ही उनकी जात
वह समझती थी, आदमी और जानवर की बात 

जब कोई पत्थर मारकर उनको करता ज़ख़्मी
एक दो पत्थर खाकर पगली बुढ़िया उनको बचाती
अब तो सब ख़त्म
कल ले जाएँगे यहाँ से आदमी उसको
वे मरें, तो जहाँ फेंकते उनको 
वहाँ कल फेंक देंगे बुढ़िया को 

- जेन्नी शबनम (5. 11. 2010)
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गुरुवार, 4 नवंबर 2010

186. जागता-सा कोई एक पहर जारी है (तुकांत)

जागता-सा कोई एक पहर जारी है

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रात बीती और तमन्ना जागने लगी, ये दहर जारी है
क़यामत से कब हो सामना, सोच में वो क़हर जारी है 

मुख़ातिब होते रहे, हर रोज़, फिर भी हँस न सके हम
ज़ख़्म घुला तड़पते रहे, फैलता बदन में ज़हर ज़ारी है 

शिकायत की उम्र बीती, अब सुनाने से क्या फ़ायदा
जल-जलकर दहकता है मन, ताव की लहर जारी है  

उजाला चहुँ ओर पसरा, जाने आफ़ताब है या बिजली
रात या दिन पहचान नहीं हमें, जलता शहर जारी है 

ख़ामोशी की ज़बाँ समझे जो, उससे क्या कहे 'शब'
शेष नहीं फिर भी, जागता-सा कोई एक पहर जारी है 
...............................
दहर - काल / संसार
...............................

- जेन्नी शबनम (4. 11. 2010)
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शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2010

185. किसी बोल ने चीर तड़पाया (तुकांत)

किसी बोल ने चीर तड़पाया

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पोर-पोर में पीर समाया
किसने है ये तीर चुभाया  

मन का हाल नहीं पूछा और
पूछा किसने धीर चुराया  

गूँगी इच्छा का मोल ही क्या
गंगा का बस नीर बताया  

नहीं कभी कोई राँझा उसका
फिर भी सबने हीर बुलाया 

न भूली शब्दों की भाषा 'शब'
किसी बोल ने चीर तड़पाया 

- जेन्नी शबनम (29. 10. 2010)
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गुरुवार, 28 अक्टूबर 2010

184. पहला और आख़िरी वरदान

पहला और आख़िरी वरदान

***

वह हठी ये क्या कर गया
विष माँगा, वह अमृत चखा गया
एक बूँद अमृत, हलक़ में उतार गया
आह! ये कैसा ज़ुल्म कर गया। 

उस दिन कहा था उसने 
वक़्त को ललकारा तुमने
मृत्यु माँगी असमय तुमने
इसलिए है ये शाप
सदा जीवित रहो तुम  
अमरता का है तुमको वरदान 

अब तो निर्भय जीवन
अविराम, चलायमान जीवन
जीवित रहना है, जाने और कितनी सदी 
कभी नहीं होगी मृत्यु 
कभी न मिलेगी मुक्ति
तड़प-तड़पकर जीना, शायद तब तक
नष्ट न हो समस्त क़ायनात तब तक 

लाख करूँ प्रार्थना
अब नहीं कोई तोड़
चख भी लें जो अमृत
तो सम्भव नहीं, होना मृत 

ख़ौफ़ बढ़ता जा रहा
ये मैंने क्या कर लिया?
क्यों उसके छल में आ गई?
क्यों चख लिया अमृत?
क्यों माँगा था विष?
क्यों वक़्त से पहले मृत्यु चाही?
क्यों? क्यों? क्यों?

जानती थी, वह देवदूत है
दे रहा मुझे, पहला और आख़िरी वरदान है
फिर क्यों अपने लिए 
ज़िन्दगी नहीं, मैंने मौत माँग ली 

माँगना था, तो प्रेमपूर्ण दुनिया माँगती
जब तक जियूँ, बेफ़िक्र जियूँ
सभी अपनों का प्रेम पाऊँ
कोई दुःखी न हो, सर्वत्र सुख हो, आनन्द हो 

चूक मेरी, भूल मेरी
ज़िन्दगी नहीं, मृत्यु की चाह की
अब मृत्यु नहीं, बस जीना है
कभी शाप-मुक्त नहीं होना है 
सब चले जाएँगे, मेरा कोई न होगा 
न शाप-मुक्त करने वाला कोई होगा 

-जेन्नी शबनम (28.10.2010)
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बुधवार, 20 अक्टूबर 2010

183. देव

देव

***

देव! देव! देव!
तुम कहाँ हो, क्यों चले गए?
एक क्षण को न ठिठके तुम्हारे पाँव
अबोध शिशु पर क्या ममत्व न उमड़ा
क्या इतनी भी सुध नहीं, कैसे रहेगी ये अपूर्ण नारी
कैसे जिएगी, कैसे सहन करेगी संताप
अपनी व्यथा किससे कहेगी
शिशु जब जागेगा, उसके प्रश्नों का क्या उत्तर देगी
वह तो फिर भी बहल जाएगा
अपने निर्जीव खिलौनों में रम जाएगा 

बताओ न देव!
क्या कमी थी मुझमें
किस धर्म का पालन न किया
स्त्री का हर धर्म निभाया
तुम्हारे वंश को भी बढ़ाया
फिर क्यों देव, यों छोड़ गए
अपनी व्यथा, अपनी पीड़ा किससे कहूँ देव?
बीती हर रात्रि की याद, क्या नाग-सी न डसेगी
जब तुम बिन ये अभागिन तड़पेगी?

जाना था, चले जाते
मैं राह नहीं रोकती देव
बस जगाकर व कहकर जाते
एक अन्तिम आलिंगन, एक अन्तिम प्रेम-शब्द
अन्तिम बार तुमको छू तो लेती
एक अन्तिम बार अर्धांगनी तुम्हारी, तुमसे लिपट तो लेती
उन क्षणों के साथ सम्पूर्ण जीवन सुख से जी लेती 

आह! देव!
एक बार कहकर तो देखते
साथ चल देती, छोड़ सब कुछ संग तुम्हारे
तुम्हारी ही तरह मैं भी बन जाती एक भिक्षुणी 

ओह! देव!
अब जो आओगे
मैं तुम्हारी प्रेम-प्रिया नहीं रहूँगी
न तुम आलिंगन करोगे
मैं अपनी पीड़ा में समाहित
एक अभागिन परित्यक्ता
तुम्हारे चरणों में लोटती
एक असहाय नारी 

संसार के लिए तुम बन जाओगे महान
लेकिन नहीं समझ पाए एक स्त्री की वेदना
चूक गए तुम पुरुष धर्म से
सुन रहे हो न!
देव! देव! देव!

-जेन्नी शबनम (20.10.2010)
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शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2010

182. नहीं होता अभिनन्दन (क्षणिका)/ nahin hota abhinandan (kshanikaa)

नहीं होता अभिनन्दन

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सहज जीवन मन का बंधन
पार होने की चाह निराशा और क्रंदन
अनवरत प्रयास विफलता और रुदन
असह्य प्रतिफल नहीं होता अभिनन्दन

- जेन्नी शबनम (15. 10. 2010)
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nahin hota abhinandan

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sahaj jivan mann ka bandhan
paar hone kee chaah niraasha aur krandan
anwarat prayaas vifalta aur rudan
asahya pratifal nahin hota abhinandan.

- Jenny Shabnam (15. 10. 2010)
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रविवार, 10 अक्टूबर 2010

181. रूह का सफ़र

रूह का सफ़र

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इस जीवन के बाद
एक और जीवन की चाह,
रूहानी इश्क़ का ख्व़ाब
है न अजब यह ख़याल!

क्या पता क्या हो
रूह हो या कि सब समाप्त हो
कहीं ऐसा न हो
शरीर ख़त्म हो और रूह भी मिट जाए
या फिर ऐसा हो
शरीर नष्ट हो और रूह रह जाए
महज़ वायु समान,
एहसास तो मुक़म्मल हो
पर रूह बेअख़्तियार हो 

कैसी तड़प होगी, जब सब दिखे पर हों असमर्थ
सामने प्रियतम हो, पर हों छूने में विफल
कितनी छटपटाहट होगी
तड़प बढ़ेगी और रूह होगी विह्वल

बारिश हो और भींग न पाएँ
भूख हो और खा न पाएँ
इश्क़ हो और कह न पाएँ
जाने क्या-क्या न कर पाएँ

सशक्त शरीर, पर होते हम असफल
रूह तो यूँ भी होती है निर्बल
जो है अभी ही कर लें पूर्ण
किसी शायद पर नहीं यक़ीन सम्पूर्ण

फिर भी, जो न मिल सका
उम्मीद से जीवन सजा लें 
शायद हो इस जन्म के बाद
रूह के सफ़र की नयी शुरुआत

- जेन्नी शबनम (10. 10. 2010)
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शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2010

180. अपने पाँव / apne paanv

अपने पाँव

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क्या बस इतना ही
और सब ख़त्म!
एक क़दम भी नहीं
और सफ़र का अंत!

उम्मीद नहीं अब चल पाऊँगी
पहुँच पाऊँगी दुनिया के उस
अंतिम छोर तक
जिसे निहारती रही अनवरत वर्षों
सोचती थी
कभी तो फ़ुर्सत मिलेगी
और जा पहुँचूँगी अपने पाँव से
वहाँ उस छोर पर
जहाँ सीमा समाप्त होती है
दुनिया की

अब नहीं जा सकूँगी कभी
बस निहारती रहूँगी
धुँधली नज़रों से
जहाँ तक भी जाए निगाह
चाहे समतल ज़मीन हो
या फिर स्वप्निल आकाश

क़दम तो न बढ़ेंगे
पर नज़र थम-थमकर
साफ़ हो जायेगी,
फिर शायद निहारूँ
उस जहाँ को
जहाँ कभी नहीं पहुँच सकूँगी
न चल सकूँगी कभी
अपने पाँव

- जेन्नी शबनम (8. 10. 2010)
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apne paanv

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kya bas itna hi
aur sab khatm!
ek kadam bhi nahin
aur safar ka ant!

ummid nahin ab chal paaungi
pahunch paaungi duniya ke us
antim chhor tak
jise niharati rahi anavarat varshon
sochti thee
kabhi to fursat milegi
aur ja pahunchungi apne paanv se
vahaan us chhor par
jahaan seema samaapt hotee hai
duniya kee.

ab nahin ja sakungi kabhi
bas nihaarti rahungi
dhundhli nazron se
jahaan tak bhi jaaye nigaah
chaahe samtal zameen ho
ya phir swapnil aakaash.

kadam to na badhenge
par nazar tham-tham kar
saaf ho jaayegi
fir shaayad nihaaroon
us jahaan ko
jahan kabhi nahi pahunch sakungi
na chal sakungi kabhi
apne paanv.

- Jenny Shabnam (8. 10. 2010)
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मंगलवार, 5 अक्टूबर 2010

179. स्याह अँधेरों में न जाना तुम / syaah andheron mein na jana tum

स्याह अँधेरों में न जाना तुम

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वो कहता
जाने क्यों कहता?
स्याह अँधेरों में
न जाना तुम
उदासी कभी भी
न ओढ़ना तुम
भोर की लालिमा-सी
सदा दमकना तुम

कैसे समझाएँ?
क्या बतलाएँ?
उजाले से दिल कितना घबराता है
चेहरे की चुप्पी में
हर अनकहा दिख जाता है
ख़ुशी ठहरती नहीं
मन तो बहुत चाहता है

मैंने कोई वादा न किया
उसने कसम क्यों न दिया?
अब तय किया है
तक़दीर के किस्से
उजालों में दफ़न होंगे
दिल में हों अँधेरे मगर
क़तार दीयों के सजेंगे
उजाले ही उजाले चहुँ ओर
'शब' के अँधेरे
किसी को न दिखेंगे

- जेन्नी शबनम (21. 9. 2010)
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syaah andheron mein na jana tum

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wo kahta
jaane kyon kahta?
syaah andheron mein
na jana tum
udaasi kabhi bhi
na odhna tum
bhor ki laalima si
sada damakna tum.

kaise samjhaayen?
kya batlaayen?
ujaale se dil kitana ghabraata hai,
chehre ki chuppi mein
har ankaha dikh jata hai
khushi thaharti nahin
mann to bahut chaahta hai.

maine koi vada na kiya
usne kasam kyon na diya?
ab taye kiya hai
par taqdir ke kisse
ujaalon mein dafan honge
dil mein hon andhere magar
qataar diyon ke sajenge
ujaale hi ujaale chahun ore
'shab' ke andhere
kisi ko na dikhenge.

- Jenny Shabnam (21. 9. 2010)
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