मंगलवार, 1 सितंबर 2009

81. ख़ुदा बना दिया (तुकान्त)

ख़ुदा बना दिया

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मिज़ाज कौन पूछे, जब ख़ुद नासाज़ हो
ये सोच हमने, ख़ुद ही सब्र कर लिया 

इश्क़ का जुनून, कैसे कोई जाने भला
वो जो मोहब्बत से, महरूम रह गया 

दाख़िल ही नहीं कभी, बेदख़ल कैसे हों
फिर भी ये सुन-सुन, ज़माना गुज़र रहा

मायूसी से बहुत, थककर पुकारा उसे
बादलों में गुम वो, फिर निराश कर गया 

तरसते लोग जहाँ में, एक ख़ुदा के वास्ते
'शब' ने जाने कितनों को, ख़ुदा बना दिया 

- जेन्नी शबनम (31. 8. 2009)
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बुधवार, 26 अगस्त 2009

80. आँखों में इश्क़ भर क्यों नहीं देते हो (तुकान्त)

आँखों में इश्क भर क्यों नहीं देते हो

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दावा करते तुम, आँखों को मेरी पढ़ लेते हो
फिर दर्द मेरा तुम, समझ क्यों नहीं लेते हो? 

बारहा करते सवाल, मेरी आँखों में नमी क्यों है
माहिर हो, जवाब ख़ुद से पूछ क्यों नहीं लेते हो? 

कहते हो कि समंदर-सी, मेरी आँखें गहरी है
लम्हा भर उतरकर, नाप क्यों नहीं लेते हो? 

तुम्हारे इश्क़ की तड़प, मेरी आँखों में बहती है
आकर लबों से अपने, थाम क्यों नहीं लेते हो? 

हम रह न सकेंगे तुम बिन, जानते तो हो
फिर आँखों में मेरी, ठहर क्यों नहीं जाते हो? 

ज़ाहिर करती मेरी आँखें, तुमसे इश्क़ है
बड़े बेरहम हो, क़ुबूल कर क्यों नहीं लेते हो?

मेरे दर्द की तासीर, सिर्फ़ तुम ही बदल सकते हो
फिर मेरी आँखों में इश्क़, भर क्यों नहीं देते हो?

वक़्त का हिसाब न लगाओ, कहते हो सदा
'शब' की आँखों से, कह क्यों नहीं देते हो?

- जेन्नी शबनम (19. 8. 2009)
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मंगलवार, 18 अगस्त 2009

79. हम दुनियादारी निभा रहे (तुकान्त)

हम दुनियादारी निभा रहे

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एक दुनिया, तुम अपनी चला रहे
एक दुनिया, हम अपनी चला रहे 

ख़ुदा तुम सँवारो दुनिया, बहिश्त-सा
महज़ इंसान हम, दुनियादारी निभा रहे 

हवन-कुंड में कर अर्पित, प्रेम-स्वप्न
रिश्तों से, घर हम अपना सजा रहे 

समाज के क़ायदे से, बग़ावत ही सही
एक अलग जहाँ, हम अपना बसा रहे 

अपने कारनामे को देखते, दीवार में टँगे
जाने किस युग से, हम वक़्त बीता रहे 

सरहद की लकीरें बँटी, रूह इंसानी है मगर
तुम सँभलो, पतवार हम अपनी चला रहे 

शब्द ख़ामोश हुए या ख़त्म, कौन समझे
'शब' से दुनिया का, हम फ़ासला बढ़ा रहे 

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बहिश्त - स्वर्ग / जन्नत 
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- जेन्नी शबनम (17. 8. 2009)
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मंगलवार, 11 अगस्त 2009

78. यही अर्ज़ होता है (तुकान्त)

यही अर्ज़ होता है

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मजरूह सही, ये दर्द-ए-इश्क़ का तर्ज़ होता है
तजवीज़ न कीजिए, इंसान बड़ा ख़ुदगर्ज़ होता है 

आप कहते हैं कि हर मर्ज़ की दवा, है मुमकिन
इश्क़ में मिट जाने का जुनून, भी मर्ज़ होता है 

दोस्त न सही, दुश्मन ही समझ लीजिए हमको
दुश्मनी निभाना भी, दुनिया का एक फर्ज़ होता है 

आप मनाएँ हम रूठें, बड़ा भला लगता हमको
आप जो ख़फ़ा हो जाएँ तो, बड़ा हर्ज़ होता है 

खुशियाँ मिलती हैं ज़िन्दगी-सी, किस्तों में मगर
हँसकर उधार साँसे लेना भी, एक कर्ज़ होता है 

वो करते हैं हर लम्हा, हज़ार गुनाह मगर
मेरी एक गुस्ताख़ी का, हिसाब भी दर्ज़ होता है 

इश्क़ से महरूम कर, दर्द बेहिसाब न देना 'शब' को
हर दुश्वारी में साथ दे ख़ुदा, बस यही अर्ज़ होता है
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मजरूह - घायल / ज़ख्मी
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- जेन्नी शबनम (11. 8. 2009)
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गुरुवार, 6 अगस्त 2009

77. काश! हम ज़ंजीर बने न होते

काश! हम ज़ंजीर बने न होते

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नहीं मालूम कब
हम प्रेम पथिक से, लौह-ज़ंजीर बनते चले गए
वक़्त और ज़िन्दगी की भट्ठी में
हमारे प्रेम की अक्षुण्ण सम्पदा जल गई
और ज़ंजीर की एक-एक कड़ी की तरह
हम जुड़ते चले गए।  

कभी जिस्म और रूह का कुँवारापन
तो कभी हमारा मौन प्रखर-प्रेम कड़ी बना
कभी रिश्ते की गाँठ और हमारा अनुबंध
कभी हमारी मान-मर्यादा और रीति-नीति
तो कभी समाज और कानून कड़ी बना।  

कभी हम फूलों से, एक दूसरे का दामन सजाते रहे
और उसकी ख़ुशबू में हमारा कस्तूरी देह-गंध कड़ी बना
कभी हम कटु वचन-बाणों से एक दूसरे को बेधते रहे
कि ज़ख़्मी क़दम परिधि से बाहर जाने का साहस न कर सके
और आनन्द की समस्त संभावनाओं का मिटना एक कड़ी बना

वक़्त और ज़िन्दगी के साथ, हम तो न चल सके
मगर हमारी कड़ियों की गिनती रोज़-रोज़ बढ़ती गई
हम दोनों, दोनों छोर की कड़ी को मज़बूती से थामे रहे
हर रोज़, एक-एक कड़ी जोड़ते रहे और दूर होते रहे
ये छोटी-छोटी कड़ियाँ मिलकर बड़ी ज़ंजीर बनती गई

काश! हम ज़ंजीर बने न होते
हमारे बीच कड़ियों के टूटने का भय न होता
मन, यूँ लौह-सा कठोर न बनता
हमारा जीवन, यूँ सख़्त कफ़स न बनता
बदनुमा का इल्ज़ाम, एक दूसरे पर न होता

प्रेम के धागे से बँधे सिमटे होते
एक दूसरे की बाहों में संबल पाते
उन्मुक्त गगन में उड़ते फिरते
हम वक़्त के साथ क़दम मिलाते
उम्र का पड़ाव वक़्त की थकान बना न होता

ख़ुशी यूँ बेमानी नहीं, इश्क बन गया होता
हम बेपरवाह, बेइंतिहा मोहब्बत के गीत गाते
ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा, रूमानी बन गया होता
हम इश्क़ के हर इम्तहान से गुज़र गए होते
काश! हम ज़ंजीर बने न होते

- जेन्नी शबनम (3. 8. 2009)
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सोमवार, 27 जुलाई 2009

76. उजाला पी लूँ (क्षणिका) / Ujaala pee loon (kshanika)

उजाला पी लूँ 

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चाहती हूँ दिन के उजाले की कुछ किरणें
मुट्ठी में बंद कर लूँ
जब घनी काली रातें लिपटकर डराती हों मुझे
मुट्ठी खोल, थोड़ा उजाला पी लूँ
थोड़ी-सी, ज़िन्दगी जी लूँ

- जेन्नी शबनम (नवम्बर, 2003)
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Ujaala pee loon

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chaahti hoon din ke ujaale kee kuchh kirneyen
mutthi mein band kar loon
jab ghani kaalee raateyen lipatkar daraati hon mujhey
mutthi khol, thoda ujaala pee loon
thodi-see, zindagi jee loon.

- Jenny Shabnam (November, 2003)
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शुक्रवार, 24 जुलाई 2009

75. काश! कोई ज़ंजीर होती (क्षणिका) / kaash! koi zanjeer hotee (kshanika)

काश! कोई ज़ंजीर होती 

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वीरान राहों पर तन्हा ख़ामोश चल रही हूँ
थक गई हूँ टूट गई हूँ
न जाने कैसी राह है ख़त्म नहीं होती
समय की कैसी बेबसी है एक पल को थम नहीं पाती
काश! कोई ज़ंजीर होती
वक़्त और ज़िन्दगी के पाँव जकड़ देती

- जेन्नी शबनम (24. 7. 2009)
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kaash! koi zanjeer hotee 

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veeraan raahon par tanha khaamosh chal rahee hoon
thak gaee hoon toot gaee hoon,
na jaane kaisee raah hai khatm nahin hoti
samay kee kaisee bebasi hai ek pal ko tham nahin paatee
kaash! koi zanjeer hotee
waqt aur zindagi ke paanv jakad detee.

- Jenny Shabnam (24. 7. 2009)
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बुधवार, 22 जुलाई 2009

74. शमा बुझ रही (तुकान्त)

कुछ शेर हैं नज़्म-सा सही, नाम क्या दूँ ये पता भी नहीं,
जो नाम दें आपकी मर्ज़ी, पेश है शमा पर मेरी एक अर्ज़ी

शमा बुझ रही

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शमा बुझ रही, आओ जल जाओ, है नशीली सुरूर मयकशी
मिट गई तो फिर करनी होगी, उम्र तन्हा बसर, ऐ परवानों 

बुझने से पहले हर शमा, है धधकती बेइंतिहा दिलकशी
बुझ रही शमा तो आ पहुँचे, फिर क्यों मगर, ऐ जलनेवालों

सहर होने से पहले है बुझना, फिर क्यों भला छायी मायूसी
ढूँढ़ लो अब कोई हसीन शमा, बदलकर डगर, ऐ मतवालों

जाओ लौट जाओ हमदर्द मुसाफ़िरों, अब हुई साँस आख़िरी
फ़िजूल ही ढल गया, जाने क्यों उम्र का हर पहर, ऐ सफ़रवालों

मिज़ाज अब क्या पूछते हो, बस सुन लो उसकी बेबस ख़ामोशी
जल रही थी जब तड़पकर, तब तो न लिए ख़बर, ऐ शहरवालों

सलीक़ा बताते हो मुद्दतों जीने का क्यों, है ये वक़्त-ए-रुख़सती
बेशक शमा से सीख लो, शिद्दत से मरने का हुनर, ऐ उम्रवालों

शमा की हर साँस तड़प रही जलने को, बुझ जाना है नियति
इल्तिज़ा है, दम टूटने से पहले देख लो एक नज़र, ऐ दिलवालों

जल चुकी दम भर शमा, जान लो 'शब', है ये दस्तूर-ए-ज़िन्दगी
ख़त्म हुआ, अब मान भी लो, इस शमा का सफ़र, ऐ जहाँवालों

- जेन्नी शबनम (25. 5. 2009)
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शनिवार, 18 जुलाई 2009

73. मेरी ज़िन्दगी

मेरी ज़िन्दगी

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ज़िन्दगी मेरी 
कई रूप में सामने आती है
ज़िन्दगी को पकड़ सकूँ
दौड़ती हूँ, भागती हूँ, झपटती हूँ
साबूत न सही
कुछ हिस्से तो पा लूँ  

हर बार ज़िन्दगी हँसकर
छुप जाती है
कभी यूँ भाग जाती है 
जैसे मुँह चिढ़ा रही हो
कभी कुछ हिस्से नोच भी लूँ
तो मुट्ठी से फिसल जाती है 

जाने जीने का शऊर नहीं मुझको
या हथेली छोटी पड़ जाती है
न पकड़ में आती, न सँभल पाती है 
मुझसे मेरी ज़िन्दगी 

- जेन्नी शबनम (18. 7. 2009)
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गुरुवार, 16 जुलाई 2009

72. नेह-निमंत्रण तुम बिसरा गए

नेह-निमंत्रण तुम बिसरा गए

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नेह-निमंत्रण तुम बिसरा गए
फिर आस खोई तो क्या हुआ?
सपनों के बिना भी हम जी लेंगे
मेरा दिल टूटा तो क्या हुआ?

मुसकान तुम्हारी, मेरा चहकना
फिर हँसी रोई तो क्या हुआ?
यक़ीन हम पर न तुम कर पाए
मेरा दम्भ हारा तो क्या हुआ?

ख़्वाबों में भी जो तुम आ जाओ
तन्हा रात मिली तो क्या हुआ?
मन का पिंजरा, अब भी है खुला
मेरा तन हारा तो क्या हुआ?

तुम तक पहुँचती, सब राहों पर
अंगारे बिछे भी तो क्या हुआ?
इरादा किया, तुम तक है पहुँचना
पाँव ज़ख़्मी मेरा तो क्या हुआ?

मुक़द्दर का ये खेल देखो
फिर मात मिली तो क्या हुआ?
अजनबी तुम बन गए, अब तो
फिर आघात मिला तो क्या हुआ?

मुश्किल है, फिर भी है जीना
ज़िन्दगी सौग़ात मिली तो क्या हुआ?
उम्मीद की उदासी, रुख़सत होगी
अभी वक़्त है ठहरा तो क्या हुआ ?

- जेन्नी शबनम (24. 5. 2009)
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71. कोई बात बने (अनुबन्ध/तुकान्त) (पुस्तक- नवधा)

कोई बात बने

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ज़ख़्म गहरा हो औ ताज़ा मिले, तो कोई बात बने
थोड़ी उदासी से, न कोई ग़ज़ल न कोई बात बने

दस्तूर-ए-ज़िन्दगी, अब मुझको न बताओ यारो
एक उम्र जो फिर मिल जाए, तो कोई बात बने 

मौसम की तरह हर रोज़, बदस्तूर बदलते हैं वो
गर अब के जो न बदले मिज़ाज, तो कोई बात बने 

रूठने-मनाने की उम्र गुज़र चुकी, अब मान भी लो
एक उम्र में जन्म दूजा मिले, तो कोई बात बने 

उनके मोहब्बत का फ़न, बड़ा ही तल्ख़ है यारो
फ़क़त तसव्वुर में मिले पनाह, तो कोई बात बने 

रख आई 'शब' अपनी ख़ाली हथेली उनके हाथ में
भर दें वो लकीरों से तक़दीर, तो कोई बात बने

-जेन्नी शबनम (15. 7. 2009)
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शुक्रवार, 10 जुलाई 2009

70. बुरी नज़र (क्षणिका)

बुरी नज़र 

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कुछ ख़ला-सी रह गई ज़िन्दगी में
जाने किसकी बददुआ लग गई मुझको
कहते थे सभी कि ख़ुद को बचा रखूँ बुरी नज़र से
हमने तो रातों की स्याही में ख़ुद को छुपा रखा था

- जेन्नी शबनम (10. 7. 2009)
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रविवार, 5 जुलाई 2009

69. 'शब' की मुराद (अनुबन्ध/तुकान्त)

'शब' की मुराद

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'शब' जब 'शव' बन जाए, उसको कुछ वक़्त रहने देना
बेदस्तूर सही, सहर होने तक ठहरने देना

उम्र गुज़ारी है 'शब' ने अँधेरों में
रोशनी की एक नज़र पड़ने देना

डरती है बहुत 'शब' आग में जलने से
दुनियावालो, उसे दफ़न करने देना 

मज़हब का सवाल जो उठने लगे तो
सबको वसीयत 'शब' की पढ़ने देना 

ढक देना माँग की सिन्दूरी लाली को
वजह-ए-वहशत 'शब' को न बनने देना

जगह नहीं दे मज़हबी जब दफ़नाने को
घर में अपने, 'शब' की क़ब्र बनने देना

तमाम ज़िन्दगी बसर हुई तन्हा 'शब' की
जश्न भारी औ मजमा भी लगने देना

अश्क़ नहीं फूलों से सजाना 'शब' को
'शब' के मज़ार को कभी न ढहने देना

'शब' की मुराद, पूरी करना मेरे हमदम
'शब' के लिए, कोई मर्सिया न पढ़ने देना

-जेन्नी शबनम (नवम्बर, 1998)
('ज़ख़्म' फ़िल्म से प्रेरित)  
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शनिवार, 4 जुलाई 2009

68. आज़माया हमको (अनुबन्ध/तुकान्त)

आज़माया हमको

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बेख़याली ने कहाँ-कहाँ न भटकाया हमको
होश आया तो तन्हाई ने तड़पाया हमको

इस बाज़ार की रंगीनियाँ लुभाती नहीं हैं अब  
नन्ही आँखों की उदासी ने रुलाया हमको

उन अनजान-सी राहों पर यूँ चल तो पड़े हम  
असूफ़ों और फ़रिश्तों ने आज़माया हमको

वज़ह-ए-निख़्वत उनकी दूर जो गए हम
मिले कभी फिर तो गले भी लगाया हमको

रुसवाइयों से उनकी तरसते ही रहे हम
इश्क़ की हर शय ने बड़ा सताया हमको

दर्द दुनिया का देखके घबराई बहुत 'शब'
ऐ ख़ुदा ऐसा ज़माना क्यों दिखाया हमको

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असूफ़- दुष्ट
वजह-ए-निख़्वत- अंहकार के कारण
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-जेन्नी शबनम (4. 7. 2009)
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शुक्रवार, 3 जुलाई 2009

67. मुमकिन नहीं है (अनुबन्ध/तुकान्त)

मुमकिन नहीं है

***

परों को कतर देना अब तो ख़ुद ही लाज़िमी है
वरना उड़ने की ख़्वाहिश, कभी मरती नहीं है। 

कोई अपना कहे, ये चाहत तो बहुत होती है
पर अपना कोई समझे, तक़दीर ऐसी नहीं है। 

अपना कहूँ, ये ज़िद तुम्हारी बड़ा तड़पाती है
अब मुझसे मेरी ज़िन्दगी भी, सँभलती नहीं है। 

तुम ख़फा होकर चले जाओ, मुनासिब तो है
मैं तुम्हारी हो सकूँ कभी, मुमकिन ही नहीं है

ग़ैरों के दर्द में, सदा रोते उसे है देखा 
'शब' अपनी व्यथा, कभी किसी से कहती नहीं है।

-जेन्नी शबनम (3. 7. 2009)
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सोमवार, 29 जून 2009

66. आख़िर क्यों

आख़िर क्यों

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बेअख़्तियार दौड़ी थी
जाने क्यों?
कुछ पाने या खोने
जाने क्यों?
कुछ लम्हों की सौग़ात मिली
साथ दर्द इक इनाम मिला,
अंहकार की घोर टकराहट थी
और भय की अखंडित दीवार थी,
पाट सकी न अपना संशय
जता सकी न अपना आशय,
पाप-पुण्य से परे प्यासे तन
सत्य-असत्य से विचलित मन,
बाँट सकी न अपनी निराशा
दिला सकी न कोई आशा,
थम सकी न मेरी राहें
थाम सकी न कोई बाहें,
बेतहाशा भागी थी
आख़िर क्यों?
क्या पाया, क्या खोया 
आख़िर क्यों?

- जेन्नी शबनम (नवम्बर 2008)
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शुक्रवार, 26 जून 2009

65. सपनों के उपले

सपनों के उपले

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अपने सपनों से
कुछ उपले बनाई हूँ,
उपलों को सुलगाकर
जीवन सेंक रही हूँ,
कहीं मेरी ज़िन्दगी
जम न जाए 

मन को भूख जब सताती है
उपलों को दहकाकर
ख़्वाहिशों का खाना पकाती हूँ,
कहीं आत्मा
भूखी मर न जाए 

अकेलेपन की व्याकुलता
जब तड़पाती है
उपलों को धधकाकर
जीवन का सन्देश तलाशती हूँ,
कहीं ज़िन्दगी
और बोझिल न हो जाए 

जीवन का अँधियारा
जब डराता है
उपलों को जलाकर
उजाला तलाशती हूँ,
कहीं भटककर
मंज़िल खो न जाए 

- जेन्नी शबनम (अक्टूबर 2005)
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बुधवार, 24 जून 2009

64. कृष्ण! एक नई गीता लिखो

कृष्ण! एक नई गीता लिखो

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फ़र्क़ नहीं पड़ता तुम्हें 
जब निरीह मानवता, बेगुनाह मरती है
फ़र्क़ पड़ता है तुम्हें 
जब कोई तुम्हारे आगे सिर नहीं नवाता है  
जाने कितना कच्चा धर्म है तुम्हारा 
किसी की अवहेलना से उबल जाता है
निरपराधों की आहुति से मन नहीं भरता 
अबोधों का बलिदान चाहता है। 

जो मानवता के कलंक हैं 
उन पर अपनी कृपा दिखाते 
जो इन्सानी धर्म निभाते, उन्हें जीते-जी नरक दिखाते 
तुमने कहा था, जो तुम चाहो वही होता 
तुम्हारे इशारे से चलती है दुनिया
तुम्हारी इच्छा के विपरीत कोई क्षण भी न गुज़रता 
न दुनिया का दस्तूर है बदलता। 

फिर क्या समझूँ, ये तुम्हारी लीला है?
हिन्सा और अत्याचार का ये तुम्हें कैसा नशा है?
विपदाओं के पहाड़ तले 
दिलासा का झूठा भ्रम क्यों देते हो?
पाखण्डी धर्म-गुरुओं की ऐसी क़ौम क्यों उपजाते हो?

कैसे कहते हो, कलियुग में ऐसा ही घोर अनर्थ होगा
क्या तुम्हारे युग में आतंक और अत्यचार न हुआ था?
तुम तो ईश्वर हो 
फिर क्यों जन्म लेना पड़ा तुम्हें सलाख़ों के अन्दर 
कहाँ थी तुम्हारी शक्ति 
जब तुम्हारी नवजात बहनों की निर्मम हत्या होती रही?

स्त्री को उस युग में भी 
एक वस्तु बनाकर पाँच मर्दों में बाँट दिया
अर्धनग्न नारी को जग के सामने शर्मसारकर 
ये कैसा खेल दिखाया
कौरव-पाण्डव में युद्ध करवाकर 
रिश्तों में दुश्मनी का पाठ पढ़ाया 
अपनों की हत्या करने का 
संसार को भयावह रूप दिखाया। 

क्या और कोई तरीक़ा नहीं था?
रिश्तों की परिभाषा का
जीवन के दर्शन का
समाज के उद्धार का
विश्व के विघटन का
तुम्हारी शक्ति का
उस युग के अन्त का। 

धर्म-जाति सब बँट चुके, रिश्तों का भी क़त्ल हुआ
तुम्हारी सत्ता में था अँधियारा फैला 
फिर मानव से कैसे उम्मीद करें?
द्वापर में जो धर्म था, वह तुम्हारे समय का सत्य था
अब अपनी गीता में इस कलियुग की बात कहो 

कृष्ण! आओ! इस युग में आकर इन्सानी धर्म सिखाओ
अवतरित होकर एक बार फिर जगत् का उद्धार करो
प्रेम-सद्भाव का संसार रचाकर एक नया युग बसाओ
आज के युग के लिए समकालीन एक नई गीता लिखो 

- जेन्नी शबनम (24.6.2009)
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शुक्रवार, 12 जून 2009

63. बारिश / Baarish

बारिश

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बारिश में भीगने से, हुई जो मेरी मनाही
क्या करूँ, मदमस्त घनघोर घटा छा गयी,
जाऊँ कहाँ, अब किस-किस घर में लूँ पनाह
कहीं जाने से पहले, मेरे घर की छत चू पड़ी  

ठंडी फुहारों संग, हर ग़म है उघड़ता
बरसती बूँदों में, आँसू भी तो है छुपता,
रिमझिम-रिमझिम बादल, यूँ है गरजता बरसता
जैसे तड़पके रो दिया हो, आसमान बेसाख़्ता  

बरखा की बूँदों संग, मन यूँ है लरजता
छुप जाऊँ जैसे, हो सीना महबूब का,
बरखा में भीगता है तन, मन यूँ है मचलता
आगोश में जैसे, पिघलता है बदन, महबूब का  

वो तो कहते हैं, ये तमाम उम्र की है, मेरी सज़ा
अब कैसे कहूँ कि बारिश से, मुझे प्यार है कितना,
भीगूँगी तो फिर भी, जैसे भीगती रही हूँ सदा
अब उनसे न कहूँगी, मन में क्या-क्या है बसा  

- जेन्नी शबनम (अगस्त, 2008)
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Baarish

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Baarish mein bhigne se, hui jo meri manaahi
Kya karoon, madmast ghanghore ghata chha gai,
Jaaoon kahaan, ab kis-kis ghar mein lun panaah
Kahin jaane se pahle, mere ghar kee chhat choo padi.

Thandee fuhaaron sang, har gam hai ughadta
Barasti boondon mein, aansoo bhi to hai chhupta,
Rimjhim-rimjhim baadal, yun hai garajta barasta
Jaise tadap ke ro diya ho, aasmaan besaakhta.

Barkha kee boondon sang, man yun hai larajta
Chhup jaaoon jaise, ho seena mahboob ka,
Barkha mein bheegta hai tan, man yun hai machalta
Aagosh mein jaise pighalta hai, badan mahboob ka.

Wo to kahte hain, ye tamam umrr ki hai, meri saza
Ab kaise kahoon ki baarish se, mujhe pyar hai kitna,
Bhigoongi to phir bhi, jaise bhigti rahi hoon sada
Ab unse na kahoogi, man mein kya-kya hai basa.

- Jenny Shabnam (August, 2008)

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गुरुवार, 4 जून 2009

62. ख़त

ख़त

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इबारत लिख प्रेम की
लिफ़ाफ़े में रख, छुपा देती हूँ,
भेजूँगी ख़त महबूब को  

पन्नों से फिसल जाते हैं हर्फ़
और प्रेम की जगह छप जाता है दर्द,
जाने कौन बदल देता है?

कभी न चाहा कि बाँटूँ अपना दर्द
अमानत है, जो ख़ुदा ने दी कि रखूँ सहेजकर,
उसके लिए मुझसा भरोसेमंद, शायद कोई नहीं  

हैरान हूँ, परेशान हूँ
पैग़ाम न भेज पाने से, उदास हूँ,
कैसे भेजूँ, दर्द में लिपटा कोई ख़त?

या खुदा! हर्फ़ मेरा बदल जाता जो
तक़दीर मेरी क्यों न बदल पाता वो?
ख़तों के ढेर में, रोज़ इज़ाफा होता है  

सारे ख़त, अपनी रूह में छुपाती हूँ,
क्यों लिखती हूँ वो ख़त?
जिन्हें कभी कहीं पहुँचना ही नहीं है  

अब सारे ख़त, प्रेम या दर्द
मेरे ज़ेहन में रोज़ छपते हैं,
और मेरे साथ ज़िन्दगी जीते हैं 

- जेन्नी शबनम (दिसंबर, 2008)
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शुक्रवार, 29 मई 2009

61. दफ़ना दो यारों (तुकान्त)

दफ़ना दो यारों

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चंदा की चाँदनी से रौशनी बिखरा गया कोई 
हसीन हुई है रात, सिर्फ़ इतना देखो यारों,
कौन बिखरा गया रंगीनी, ये न पूछो कोई 
रौशन हुई है रात, बस बहक जाओ यारों

सूरज की तपिश से, अगन लगा गया कोई 
दहक रही है रात, सिर्फ़ इतना देखो यारों,
कौन जला गया दामन, ये न पूछो कोई 
जल रही है रात, बस जश्न मनाओ यारों

आसमान की शून्यता से, तक़दीर भर गया कोई 
ख़ामोश हुई है रात, सिर्फ़ इतना देखो यारों,
कौन दे गया मातम, ये न पूछो कोई 
तन्हा हुई है रात, बस ज़रा रो लो यारों

अमावास की कालिमा से, अँधियारा फैला गया कोई 
डर गई है 'शब', सिर्फ़ इतना देखो यारों,
कौन कर गया है अँधेरा, ये न पूछो कोई 
मर गई है रात, बस उसे दफ़ना दो यारों


- जेन्नी शबनम (28. 5. 2009)
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शुक्रवार, 22 मई 2009

60. राजनीति

राजनीति

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तिश्नगी राजनीति की, बड़ी तिलिस्मी होती है
दफ़न मुर्दा जी पड़े (मिले जो कुर्सी), ऐसी ताक़त होती है  
भाड़ में जाए देश सेवा, स्व-सेवा (बस एक धर्म) होती है
भरता रहे भण्डार अपना (विदेश में), ऐसी तिजारत होती है 

इंसानों की ये चौथी जात (राजनेता), बड़ी रहस्यमयी है
कुर्ता-पायजामा (धोती), टोपी-अँगरखा, इनकी पहचान होती है 
इस सफ़ेद पहनावे की चाल, बड़ी ख़तरनाक, रक्तिम-काली है
कीचड़ उछालने और घात पहुँचाने में, इनको महारत हासिल होती है  

क़ौमी एकता की, इससे अच्छी मिसाल, दुनिया में नहीं होती
धर्म-जाति का फ़साद उखाड़ने में, कमरे के भीतर इनकी साँठ-गाँठ होती है  
दिख जाए कुर्सी का हसीन चेहरा, दल-बदल के तिकड़म में फिर देर नहीं होती
बेबस जनता फिर भी, संवैधानिक अधिकार (मतदान) के उपयोग के लिए लाचार होती है 

तिश्नगी राजनीति की, बड़ी तिलिस्मी होती है
ईमान बेच कमाए, ऐसी तिजारत होती है 

- जेन्नी शबनम (मई 22, 2009)
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गुरुवार, 21 मई 2009

59. ज़िन्दगी तमाम हो जाएगी

ज़िन्दगी तमाम हो जाएगी

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पल भर मिले
लम्हा भर थमे
क़दम भर भी तो साथ न चले,
यूँ साथ हम चले ही कब थे?
जो अब, न चलने का हुक्म देते हो 
एक दूसरे को, आख़िरी पल-सा देखते हुए
दो समीप समानांतर राहों पर चल दिए थे,
चाहा तो तुमने ही था सदा, मैंने नहीं,
फिर भी, इल्ज़ाम मुझे ही देते हो  
चलो यूँ ही सही, ये भी क़ुबूल है
मेरी व्यथा ही, तुम्हारा सुकून है,
बसर तो होनी है, हर हाल में हो जाएगी
सफ़र मुकम्मल न सही
ज़िन्दगी तमाम हो जाएगी 

- जेन्नी शबनम (21. 5. 2009)
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बुधवार, 20 मई 2009

58. कविता ख़ामोश हो गई है

कविता ख़ामोश हो गई है

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कविता पल-पल बनती है
मन पर शाया होती है,
उतार सकूँ काग़ज़ पर
रोशनाई की पहचान, अब मुझसे नहीं होती
मन की दशा का अब कैसा ज़िक्र
कविता ख़ामोश हो गई है

कविता कैसे लिखूँ ?
सफ़ेद रंगों से, सफ़ेद काग़ज़ पर, शब्द नहीं उतार पाती,
रंगों की भाषा कोई कैसे पहचाने
जब काग़ज़ रंगहीन दिखता हो
किसी के मन तक पहुँचा सकूँ
जाने क्यों, कभी-कभी मुमकिन नहीं होता

एक अनोखी दुनिया में
वक़्त को दफ़न कर आई हूँ,
खो आई हूँ कुछ अपना
जाने क्यों, अब ख़ुद को दग़ा देती हूँ
मन की उपज, वक़्त की कोख में दम तोड़ देती है
ज़िन्दगी और वक़्त का बही-खाता भी वहीं छोड़ आई हूँ

- जेन्नी शबनम (19. 5. 2009)
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बुधवार, 6 मई 2009

57. मेरी कविता में तुम ही तो हो

मेरी कविता में तुम ही तो हो

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तुम कहते, मेरी कविता में तुम नहीं होते हो
तुम नहीं, तो फिर, ये कौन होता है?
मेरी कविता तुमसे ही तो जन्मती है
मेरी कविता तुमसे ही तो सँवरती है

मेरी रगों में तुम उतरते हो, कविता जी जाती है
तुम मुझे थामते हो, कविता संबल पाती है
तुम मुझे गुदगुदाते हो, कविता हँस पड़ती है
तुम मुझे रुलाते हो, कविता भीग जाती है

मेरी कानों में तुम गुनगुनाते हो, कविता प्रेम-गीत गाती है
तुम मुझे दुलारते हो, कविता लजा जाती है
तुम मुझे आसमान देते हो, कविता नाचती फिरती है
तुम मुझे सजाते हो, कविता खिल-खिल जाती है

हो मेरी नींद सुहानी, तुम थपकी देते हो, कविता ख़्वाब बुनती है
तुम मुझे अधसोती रातों में, हौले से जगाते हो, कविता मंद-मंद मुस्काती है
तुम मुझसे दूर जाते हो, कविता की करुण पुकार गूँजती है
तुम जो न आओ, कविता गुमसुम उदास रहती है

हाँ! पहले तुम नहीं होते थे, कविता तुमसे पहले भी जीती थी
शायद तुम्हें ख़्वाबों में ढूँढ़ती, तुम्हारा इंतज़ार करती थी
हाँ! अब भी हर रोज़ तुम नहीं होते, कविता कभी-कभी शहर घूम आती है
शायद तुमसे मिलकर कविता इंसान बन गई है, दुनिया की वेदना में मसरूफ़ हो जाती है

- जेन्नी शबनम (6. 5. 2009)
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शुक्रवार, 1 मई 2009

56. आँखों में नमी तैरी है (क्षणिका)

आँखों में नमी तैरी है

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बदली घिर रही आसमान में, भादो तो आया नहीं
धुंध पसर रही आँगन में, माघ तो आया नहीं
मानो तपते जेठ की असह्य गरमी हो
घाम से मेरे मन की नरमी पिघली है
मानो सावन का मौसम बिलखता हो
आहत मन से मेरी आँखों में नमी तैरी है

- जेन्नी शबनम (8. 4. 2009)
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सोमवार, 20 अप्रैल 2009

55. ख़ुद पर कैसे लिखूँ

ख़ुद पर कैसे लिखूँ

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कल पूछा किसी ने
मैं दर्द के नग़्मे लिखती हूँ
किसका दर्द है, किसके ग़म में लिखती हूँ
मेरा ग़म नहीं ये, फिर मैं कैसे लिखती हूँ?
सोचती रही, सच में, मैं किस पर लिखती हूँ?

आज अचानक ख़याल आया, ख़ुद पर कुछ लिखूँ
अतीत की कहानी या वक़्त की नाइंसाफ़ी लिखूँ
दर्द, मैं तो उगाई नहीं, रब की मेहरबानी ही लिखूँ,
मेरा होना मेरी कमाई नहीं, ख़ुद पर क्या लिखूँ?

एक प्रश्न-सा उठ गया मन में- मैं कौन हूँ, क्या हूँ?
क्या वो हूँ, जो जन्मी थी, या वो, जो बन गई हूँ
क्या वो हूँ, जो होना चाहती थी, या वो, जो बनने वाली हूँ,
ख़ुद को ही नहीं पहचान पा रही, अब ख़ुद पर कैसे लिखूँ?

जब भी कहीं अपना दर्द बाँटने गई, और भी ले आई
अपने नसीब को क्या कहूँ, उनकी तक़दीर देख सहम गई, 
अपनी पहचान तलाशने में, ख़ुद को जाने कहाँ-कहाँ बिखरा आई
अब अपना पता किससे पूछूँ, सबको अपना आप ख़ुद ही गँवाते पाई

मेरे दर्द के नग़्मे हैं, जहाँ भी उपजते हों, मेरे मन में ठौर पाते हैं
मेरे मन के गीत हैं, जहाँ भी बनते हों, मेरे मन में झंकृत होते हैं
जो है, बस यही है, मेरे दर्द कहो या अपनों के दर्द कहो
ख़ुद पर कहूँ, या अपनों पर कहूँ, मेरे मन में बस यही सब बसते हैं

- जेन्नी शबनम (20. 4. 2009)
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शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009

54. न तुम भूले, न भूली मैं

न तुम भूले, न भूली मैं

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जिन-जिन राहों से होकर, मेरी तक़दीर चली
थक-थककर तुम्हे ढूँढ़ा, जब जहाँ भी थमी
बार-बार जाने क्यों, मैं हर बार रुकी 

किन-किन बातों का गिला, गई हर बार छली
हार-हार बोझिल मन, मै तो टूट चुकी
डर-डर जाती हूँ क्यों, मैं तो अब हार चुकी 

राहें जुदा-जुदा, डगर तुम बदले, कि भटकी मैं
नसीब है, न मुझे तुमने छला, न मैंने तुम्हें
सच है, न मुझे तुम भूले, न भूली मैं

अब तो आकर कह जाओ, कैसे तुम तक पहुँचूँ मैं
अब तो मिल जाओ तुम, या कि खो जाऊँ मैं
आख़िरी इल्तिज़ा, बस एक बार तुम्हें देखूँ मैं

- जेन्नी शबनम (17. 4. 2009)
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गुरुवार, 16 अप्रैल 2009

53. क्या बात करें (अनुबन्ध/तुकान्त)

क्या बात करें

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सफ़र ज़िन्दगी का कटता नहीं
एक रात की क्या बात करें 

हाल पूछा नहीं कभी किसी ने
ग़मे-दिल की क्या बात करें 

दर्द का सैलाब है उमड़ता
एक आँसू की क्या बात करें

इक पल ही सही क़रीब तो आओ
तमाम उम्र की क्या बात करें

मिल जाओ कभी राहों में कहीं
तुम्हारी सही अपनी क्या बात करें

एक उम्र तो नाकाफ़ी है
जीवन-पार की क्या बात करें

तुम आ जाओ या कि ख़ुदा
फ़रियाद है 'शब' की, अभी क्या बात करें

-जेन्नी शबनम (मई, 1998)
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बुधवार, 15 अप्रैल 2009

52. मैं और मछली (पुस्तक - लम्हों का सफ़र - 107)

मैं और मछली

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जल-बिन मछली की तड़प
मेरी तड़प क्योंकर बन गई?
उसकी आत्मा की पुकार
मेरे आत्मा में जैसे समा गई

उसकी कराह, चीत्कार, मिन्नत
उसकी बेबसी, तड़प, घुटती साँसें
मौत का ख़ौफ़, अपनों को खोने की पीड़ा
किसी तरह बच जाने को छटपटाता तन और मन 

फिर उसकी अंतिम साँस, बेदम बेजान पड़ा शारीर
और उसके ख़ामोश बदन से, मनता दुनिया का जश्न 

या ख़ुदा! तुमने उसे बनाया, फिर उसकी ऐसी क़िस्मत क्यों?
उसकी वेदना, उसकी पीड़ा, क्यों नहीं समझते?
उसकी नियति भी तो, तुम्हीं बदल सकते हो न!

हर पल मेरे बदन में हज़ारों मछलियाँ
ऐसे ही जनमती और मरती हैं,
उसकी और मेरी तक़दीर एक है
फ़र्क़ महज़ ज़ुबान और बेज़ुबान का है  

वो एक बार कुछ पल तड़पकर दम तोड़ती है
मेरे अन्तस् में हर पल हज़ारों बार दम टूटता है
हर रोज़ हज़ारों मछली मेरे सीने में घुटकर मरती है

बड़ा बेरहम है, ख़ुदा तू
मेरी न सही, उसकी फितरत तो बदल दे!

- जेन्नी शबनम (अगस्त, 2007)
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शुक्रवार, 10 अप्रैल 2009

51. रिश्तों का लिबास सहेजना होगा (पुस्तक - लम्हों का सफ़र - 91)

रिश्तों का लिबास सहेजना होगा

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रिश्तों के लिबास में, फिर एक खरोंच लगी
पैबंद लगा के, कुछ दिन और ओढ़ना होगा 

पहले तो छुप जाता था
जब सिर्फ़ सिलाई उघड़ती थी,
कुछ और नये टाँके
फिर नया-सा दिखता था। 

तुरपई कर-कर हाथें थक गईं
कतरन और सब्र भी चूक रहा,
धागे उलझे और सूई टूटी
मन भी अब बेज़ार हुआ। 

डर लगता अब, कल फिर फट न जाए
रफ़ू कहाँ और कैसे करुँगी
हर साधन अब शेष हुआ। 

इस लिबास से बदन नहीं ढँकता
अब नंगा तन और मन हुआ,
ये सब गुज़रा, उससे पहले
क्यों न जीवन का अंत हुआ?

सोचती हूँ, जब तक जीयूँ, आधा पहनूँ
आधा फाड़कर सहेज दूँ,
विदा होऊँगी जब इस जहान से
इसका कफ़न भी तो ओढ़ना होगा। 

रिश्तों के इस लिबास को
आधा-आधा कर सहेजना होगा। 

- जेन्नी शबनम (10. 4. 2009)
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मंगलवार, 7 अप्रैल 2009

50. रिश्तों की भीड़ (क्षणिका)

रिश्तों की भीड़ 

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रिश्तों की भीड़ में
प्यार गुम हो गया है
प्यार ढूँढ़ती हूँ
बस रिश्ते हाथ आते हैं 

- जेन्नी शबनम (7. 4. 2009)
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49. ज़िन्दगी एक बेशब्द किताब (पुस्तक - लम्हों का सफ़र - 92)

ज़िन्दगी एक बेशब्द किताब

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पन्नों से सिमट, ज़िन्दगी, हाशिए पर आ पहुँची
हसरतें हाशिए से, किताब तक जा पहुँची,
मालूम नहीं ज़िन्दगी की इबारत स्याह थी
या कि स्याही का रंग फीका था
शब्द अलिखित रह गए। 

शायद ज़िन्दगी, किताब के पन्नों से निकल
अपना वजूद ढूँढ़ने चल पड़ी,
किताब की इबारत और हाशिए क्या
अब तो शीर्षक भी लुप्त हो गए,
ज़िन्दगी बस, काग़ज़ का पुलिंदा भर रह गई,
जिसमें स्याही के कुछ बदरंग धब्बे और
हाशिए पर कुछ आड़े-तिरछे निशान छूट गए। 

शब्द-शब्द ढूँढ़कर, एहसासों की स्याही से
पन्नों पर उकेरी थी अपनी ज़िन्दगी,
सोचती थी, कभी तो कोई पढ़ेगा मेरी ज़िन्दगी,
बेशब्द बेरंग पन्ने
कोई कैसे पढ़े?

क्या मालूम, स्याही फीकी क्यों पड़ गई?
क्या मालूम, ज़िन्दगी की इबारत धुँधली क्यों हो गई?
क्या मालूम, मेरी किताब रद्दी क्यों हो गई?

शायद मेरी किताब और मेरी ज़िन्दगी
सफ़ेद-स्याह पन्नों की अलिखित कहानी है!
मेरी ज़िन्दगी एक बेशब्द किताब है!

- जेन्नी शबनम (2. 4. 2009)
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रविवार, 5 अप्रैल 2009

48. वक़्त मिले न मिले (क्षणिका)

वक़्त मिले न मिले 

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जो भी लम्हा मिले, चुन-चुनकर बटोरती हूँ
दामन में अपने जतन से सहेजती हूँ,
न जाने फिर कभी वक़्त मिले न मिले

- जेन्नी शबनम (1. 4. 2009)
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मंगलवार, 31 मार्च 2009

47. बीती यादें

बीती यादें

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याद आता है वो लम्हा बार-बार
जब तुमने
अपने दिल की बात कही थी

मैंने तुम्हें सिर्फ़ देखा
उत्तर न तो 'ना' था
न ही कोई बोल फूटा था

तुम मौन की भाषा समझ गए
मौन स्वीकृति का प्रतीक है
यह तुम भी जान गए थे

निर्विरोध मौन गूँजता रहा
तुम सही थे
इसे मैंने भी समझा था

और हमारे बीच
वो विचित्र बंधन बँध गया
जो देव-दुर्लभ दिव्य अनुभूति बन
सदा के लिए हमारे मन-प्राण को
सिक्त कर गया। 

- जेन्नी शबनम (दिसम्बर 2007)
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46. चुनाव! नेता!

चुनाव! नेता!

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राजनीति का दामन थामे, चलते कूटनीति की चाल
बड़ा कठिन है समझना इनको, चलते ऐसी-ऐसी चाल    

पूरे औरत-मर्द और आधे औरत-मर्द से अलग
एक नई बनी आदमी की जात,
हो जिनको दाँव-पेंच में महारत हासिल
ये हैं वो राजनीति के पंडित जात    

सिंहासन के पीछे-पीछे, नेता जी ऐसे भागते बदहवास
जैसे लाल कपड़ों के पीछे, सरपट भागे भड़का साँड़,
मज़हब-मज़हब, देश-देश का खेलते घृणित खेल
जैसे भूखे शेर और मेमनों के बीच होता खूँखार खेल    

हँसुआ से गेहूँ की बाली काटे, एक अकेला बेचारा हाथ
अपने कीचड़ से गँदले होते, सारे कमल एक साथ,
करो सवारी साइकिल पर, या हाथी पर हो सवार
लालटेन युग में आ पहुँचे, अब कैसे कटे सबकी रात   

हर पाँचवें वर्ष का है ये महोत्सव, बोली लगती जनता की
बिल में से निकल-निकल नेता जी, अब हाथ जोड़ते जनता की    
अब चाहे जो झपट ले गद्दी, बचेगी न मुल्क की आन
हर चिह्न आज़मा के हारी, अब तो इससे भली लगती, वही अँग्रेज़ी राज   

- जेन्नी शबनम (2005)
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सोमवार, 30 मार्च 2009

45. कामना

कामना

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चाहती हूँ तुम देखो ज़िन्दगी
मेरी नज़रों से
मेरी चाहतों से
मेरी समस्त कामनाओं से  

समझ सकोगे तुम कैसे?
तुम पुरुष हो
ख़ुदा हुए भी तो क्या
तुम बेबस हो   

तुम्हें वो आँखें न मिली
जो मेरे सपनों को देख सके
वो दिल न पाया
जो मेरे एहसासों को समझ सके   

तुम लाचार हो
मन से अपाहिज हो,
नहीं सँभाल सकते
एक औरत की कामना  

- जेन्नी शबनम (दिसंबर 2008)
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शुक्रवार, 27 मार्च 2009

44. हँसी, ख़ुशी और ज़िन्दगी बेकार है पड़ी (पुस्तक - लम्हों का सफ़र - 103)

हँसी, ख़ुशी और ज़िन्दगी बेकार है पड़ी

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हँसी बेकार पड़ी है, यूँ ही कोने में कहीं
ख़ुशी ग़मगीन रखी है, ज़ीने में कहीं
ज़िन्दगी गुमसुम खड़ी है, अँगने में कहीं,
अपने इस्तेमाल की आस लगाए
ठिठके सहमे से हैं सभी

सब कहते, सच ही कहते
कंजूस हैं हम, कायर हैं हम
सहेज सँभाल रखते, ख़र्च नहीं करते हम
अपनी हँसी, ख़ुशी और ज़िन्दगी

हमने सोचा था
जब ज़रूरत हो, इस्तेमाल कर लेंगे
वरना सँभाल रखेंगे, जन्म-जन्मांतर तक
कहीं ख़र्च न हो जाए, फ़िजूल ये सभी

आज ज़रूरत पड़ी
चाहा कि सब उठा लाएँ
डूब जाएँ उसमें, ख़ूब जी जाएँ

पर ये क्या हुआ?
हँसी रूठ गई, ख़ुशी डर गई
ज़िन्दगी मुरझा गई, सब बेकाम हो गई
बेइस्तेमाल स्वतः नष्ट हो गई

सचमुच, हम कायर हैं, कंजूस हैं
यूँ ही पड़े-पड़े बर्बाद हो गई
हमारी हँसी, ख़ुशी और ज़िन्दगी

अब जाना, संरक्षित नहीं होती
न ही सदियाँ ठहरती हैं
हँसी, ख़ुशी और ज़िन्दगी
सहेजते, सँभालते और सँजोते
सब विदा हो रही!

जब वक़्त था तो जिया नहीं
अब चाहा तो कुछ बचा नहीं,
हँसी, ख़ुशी और ज़िन्दगी
यूँ ही बेकार, अब है पड़ी

- जेन्नी शबनम (जून 2006)
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बुधवार, 25 मार्च 2009

43. अपंगता (क्षणिका)

अपंगता

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एक अपंगता होती तन की
जिसे मिलती बहुत करुणा, जग की  
एक अपंगता होती मन की
जिसे नहीं मिलती संवेदना, जग की  
तन की व्यथा दुनिया जाने 
मन की व्यथा कौन पहचाने?
तन की दुर्बलता का है समाधान
विकल्प भी हैं मौजूद हज़ार,
मन की दुर्बलता का नहीं कोई विकल्प
बस एक समाधान- प्यार, प्यार और प्यार। 

- जेन्नी शबनम (अक्टूबर, 2006)
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मंगलवार, 24 मार्च 2009

42. दुआ (क्षणिका)

दुआ 

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कोई शख्स ज़ख़्म देता, कुरेदकर नासूर बनाता
फिर कहता- "अल्लाह! उसे जन्नत बख़्श दो!"
क्या कहूँ उस ज़ालिम को 
अज़ीज़ या रक़ीब? 
जिसे जहन्नुम भी जन्नत-सा लगे
जिसे ग़ैरों के दर्द में आराम मिले,  
जाने ये कौन सी दुआ है 
जो दोज़ख़ की आग में झोंकती है
और कहती- ''जाओ जन्नत पाओ, सुकून पाओ!''

- जेन्नी शबनम (23. 3. 2009) 
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सोमवार, 23 मार्च 2009

41. यकीन

यकीन

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चाहती हूँ, यकीन कर लूँ
तुम पर और अपने आप पर
ख़ुदा की गवाही का भ्रम
और तुमसे बाबस्ता मेरी ज़िन्दगी
दोनों ही तक़दीर है
हँसूँ या रोऊँ
कैसे समझाऊँ दिल को?
एक कशमकश-सी है ज़िन्दगी
एक प्रश्नचिह्न-सा है जीवन
हर लम्हा, सारे जज़्बात, क़ैदी हैं
ज़ंजीरें टूट गईं
पर आज़ादी कहाँ?
कैसे यकीन करूँ
खुद पर और तुम पर,
तुम भी सच हो
और ज़िन्दगी भी

- जेन्नी शबनम (22. 3. 2009)
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रविवार, 22 मार्च 2009

40. बुत और काया (पुस्तक - लम्हों का सफ़र - 101)

बुत और काया

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ख़यालों के बुत ने
अरमान के होंठों को चूम लिया,
काले लिबास-सी वो रात
तमन्नाओं की रौशनी में नहा गई 

बुत की रूह और काया
पल भर को साथ मिले,
आँखों में शरारत हुई
हाथों से हाथ मिले,
प्रेम की अगन जली
क़यामत-सी बात हुई,
फिर मिलने के वादे हुए
याद रखने के इरादे हुए 

बिछुड़ने का वक़्त जब आया
दोनों के हाथ दुआ को उठे,
चेहरे पे उदासी छाई
आँखों में नमी पिघली,
दर्द मुस्कान बन उभरा
चुप-सी रात ज़रा-सी ठिठकी,
एक दूसरे के सीने में छुप
वे आँसू छुपाए ग़म भुलाए 

फिर बुत के अरमान
उसकी अपनी रूह
बुत की काया में समा गई,
फिर कभी न मिलने के लिए 

- जेन्नी शबनम (21. 3. 2009)
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39. अवैध सम्बन्ध

अवैध सम्बन्ध

(वर्षों पूर्व लिखी यह रचना, साझा कर रही हूँ। कानून और समाज में वैधता-अवैधता की परिभाषा चाहे जो हो, मेरी नज़र में हम सभी ख़ुद में एक अवैध रिश्ता जीते हैं; क्योंकि मन के ख़िलाफ़ जीना सबसे बड़ी अवैधता है और हम किसी-न-किसी रूप में ऐसे जीने को विवश हैं।) 

***

मेरी आत्मा और मेरा वजूद दो स्वतन्त्र अस्तित्व है
और शायद दोनों में अवैध सम्बन्ध है
नहीं! शायद मेरा ही मुझसे अवैध सम्बन्ध है

मेरी आत्मा मेरे वजूद को सहन नहीं कर पाती है 
और मेरा वजूद सदैव
मेरी आत्मा का तिरस्कार करता है

दो विपरीत अस्तित्व एक साथ मुझमें बस गए
आत्मा और वजूद के झगड़े में उलझ गए
एक साथ दोनों जीवन मैं जी रही
आत्मा और वजूद को एक साथ ढो रही

मेरा मैं न तो पूर्णतः आत्मा को प्राप्त है
न ही वजूद का एकाधिकार है
और बस यही मेरा मुझसे अवैध सम्बन्ध है

एक द्वंद्व, एक समझौता, जीवन जीने का अथक प्रयास
कानून और समाज की नज़र में यही तो वैध सम्बन्ध है

दो वैध रिश्तों का ये कैसा अवैध सम्बन्ध है?
स्वयं मेरी नज़र में मेरा मुझसे अवैध सम्बन्ध है

- जेन्नी शबनम (नवम्बर, 1992)
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गुरुवार, 19 मार्च 2009

38. हम अब भी जीते हैं (तुकान्त)

हम अब भी जीते हैं

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इश्क़ की हद, पूछते हैं आप बारहा हमसे
क्या पता, हम तो हर सरहदों के पार जीते हैं  

इश्क़ की रस्म से अनजान, आप भी तो नहीं
क्या कहें, हम कहाँ कभी ख़्वाबों में जीते हैं  

इश्क़ की इंतिहा, देख लीजिए आप भी
क्या हुआ गर, जो हम फिर भी जीते हैं  

इश्क़ में मिट जाने का, 'शब' और क्या अंदाज़ हो
क्या ये कम नहीं, कि हम अब भी जीते हैं  

- जेन्नी शबनम (19. 3. 2009)
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37. ख़ुद को बचा लाई हूँ (क्षणिका)

ख़ुद को बचा लाई हूँ 

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कुछ टुकड़े हैं अतीत के
रेहन रख आई हूँ, ख़ुद को बचा लाई हूँ  
साबुत माँगते हो, मुझसे मुझको
लो सँभाल लो अब, ख़ुद को जितना बचा पाई हूँ  

- जेन्नी शबनम (18. 3. 2009)
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रविवार, 8 मार्च 2009

36. एक गीत तुम गाओ न

एक गीत तुम गाओ न

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एक गीत तुम गाओ न!
एक ऐसा गीत गाओ कि -
मेरे पाँव उठ चल पड़े, घायल पड़े हैं कब से
हाथों में ताक़त आ जाए, छीन लिए गए हैं बल से
पंख फिर उग जाए, कतर दिए गए हैं छल से
सपनों को ज़मीं मिल जाए, उजाड़े गए हैं सदियों से
आत्मा जी जाए, मारी गई हैं युगों से। 

तुम गाओगे न ऐसा गीत?
एक ऐसा गीत ज़रूर गाना!

मैं रहूँ न रहूँ
पर तुम्हारे गीत से जब भी कोई जी उठे -
मैं उसके मन में जन्मूँगी
तुम्हारे गीत गुनगुनाऊँगी
स्वछंद आकाश में उडूँगी
प्रेम का जहान बसाऊँगी
युगों से बेजान थी, सदियों तक जीऊँगी। 

तुम गाओगे न ऐसा एक गीत?
मेरे लिए गा दो न एक गीत! 

- जेन्नी शबनम (8. 3. 2009)
(अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर)
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35. कल रात (पुस्तक - लम्हों का सफ़र - 29)

कल रात

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कल तमाम रात
मैंने तुमसे बातें की थी 

तुम सुनो कि न सुनो, ये मैंने सोचा नहीं
तुम जवाब न दोगे, ये भी मैंने सोचा नहीं,
तुम मेरे पास न थे, तुम मेरे साथ तो थे 

कल हमारे साथ, रात भी जागी थी
वक़्त भी जागा, और रूह भी जागी थी,
कल तमाम रात, मैंने तुमसे बातें की थी। 

कितना ख़ुशगवार मौसम था
रात की स्याह चादर में
चाँदनी लिपट आई थी
और तारे खिल गए थे। 

हमारी रूहों के बीच
ख़यालों का काफ़िला था
सवालों जवाबों की लम्बी फ़ेहरिस्त थी
चाहतों की, लम्बी क़तार थी। 

तुम्हारे शब्द ख़ामोश थे
तुम सुन रहे थे न
जो मैंने तुमसे कहा था!

तुम्हें हो कि न हो याद
पर, मेरे तसव्वुर में बस गई
कल की हमारी हर बात
कल की हमारी रात। 

कल तमाम रात
मैंने तुमसे बातें की थी। 

- जेन्नी शबनम (1. 3. 2009)
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34. कुछ पता नहीं

कुछ पता नहीं

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बेइंतिहा जीने के जुनून में
ज़िन्दगी कब कहाँ छूट गई
कुछ होश नहीं।   

कारवाँ आता रहा, जाता रहा
कोई अपना, कब बिछुड़ा
कुछ ख़बर नहीं।   

न मेरी ज़िद की बात थी, न तुम्हारी ज़िद की
ज़िन्दगी कब, ज़िल्लत बन गई
कुछ समझ नहीं।   

सागर के दो किनारों की तरह
ज़िन्दगी बँट गई
रोक सकूँ, दम नहीं।    

तूफ़ानों की गर्द
हमारे दिलों में, कब बस गई
हमें एहसास भी नहीं।   

हम भटक गए, कब, क्यों, भटक गए
कोई अंदाज़ा नहीं
कुछ पता नहीं।   

ज़िन्दगी रूठ गई, बस रूठ गई
दर्द है, शिकवा है, ख़ुद से है
कुछ तुमसे नहीं।   

तुम्हें हो कि न हो, मुझे है
गिला है, शिकायत है,
क्या तुम्हें कुछ नहीं?

- जेन्नी शबनम (7. 3. 2009)
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शुक्रवार, 6 मार्च 2009

33. ख़ुशनसीबी की हँसी (क्षणिका)

ख़ुशनसीबी की हँसी 

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चोट जब दिल पर लगती है
एक आह-सी उठती है, एक चिंगारी, दहकती है
चुपके से दिल रोता है और एक हँसी गूँजती है। 
सब पूछते- बहुत ख़ुश हो क्यों?
मैं कहती- ये ख़ुशनसीबी की हँसी है
और चुपचाप एक आँसू दिल में उतरता है।  

- जेन्नी शबनम (नवम्बर 1995)
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रविवार, 1 मार्च 2009

32. अपनी हर बात कही (अनुबन्ध/तुकान्त)

अपनी हर बात कही

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समेट ख़ुद को सीने में उसके, अपने सारे हालात कही
तर कर उसका सीना, अपने मन की बात कही। 

शाया किया अपने सुख-दुःख, उसके ईमान पर
पढ़ ले मेरा हर ग़म, बिना शब्द हर बात कही। 

आस भरी नज़रें उठीं जब, उसकी बाहें थामने को
अपने सीने से लिपटी, ख़ुद से अपनी हर बात कही। 

अच्छा है कोई न जाना, ये मेरा अपना संसार 
आस-पास नहीं है कोई, ख़ुद से अपनी हर बात कही। 

बिन सरोकार सुने क्यों कोई, एक उम्र की बात नहीं
जवाब से परे हर सवाल है, फिर भी अपनी हर बात कही। 

जन्मों का हिसाब है करना, जाने क्या-क्या और है कहना
रोज़ लिपटती, रोज़ सुबकती, 'शब' ख़ुद से ही हर बात कही। 

-जेन्नी शबनम (17. 9. 2008)
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