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जाने कैसी हवा चल रही है
न ठण्डक देती है, न साँसें देती है
बदन को छूती है
हवा अब बदल गई है
यूँ चीखती-चिल्लाती है मानो
किसी नवजात शिशु का दम अभी-अभी टूटा हो
किसी नवब्याहता का सुहाग अभी-अभी उजड़ा हो
भूख से कुलबुलाता बच्चा भूख-भूख चिल्लाता हो
बीच चौराहे किसी का अस्तित्व लुट रहा हो और
उसकी गुहार पर अट्टहास गूँजता हो।
हवा अब बदल गई है
ऐसे वीभत्स दृश्य दिखाती है
ख़ुद को सुरक्षित रखने के लिए
पलायन की विवशता से आहत
खेत-खलिहान, जंगल-पहाड़ निर्वस्त्र झुलस रहे हों।
जाने कैसी हवा है
न नाचती है, न गाती है
तड़पती, कराहती ख़ून उगलती है।
हवा अब बदल गई है
लाल लहू से खेलती है
बिखेरती है इन्सानी बदन का लहू गाँव-शहर में
और छिड़क देती है
फिर आयतें और श्लोक सुनाती है।
हवा अब बदल गई है
अपनी प्रकृति के विरुद्ध ख़ून-ख़ून कहती है
हवा बदल गई है
- जेन्नी शबनम (20.4.2011)
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